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शादी से एक हफ्ते पहले देश पर न्योछावर हो गया था बेटा, 11 साल बाद भी सरकार ने पूरे नहीं किए वादे

Wed, 15 Aug 2018 08:15 AM IST
मनन सैनी, अमर उजाला, गुरदासपुर (पंजाब)
मनन सैनी, अमर उजाला, गुरदासपुर (पंजाब) Updated Wed, 15 Aug 2018 08:15 AM IST
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after 11 years Punjab government has not fulfilled the promises to martyr's family of Gurdaspur
शहीद लांसनायक बिक्रम दत्त
एक ओर जहां जंग-ए-आजादी की 71वीं वर्षगांठ के जश्न को धूमधाम से मनाया जा रहा है वहीं इस उत्सव के पीछे एक गहन अंधेरा है और इस अंधेरे की स्याह चादर में लिपटी हुई हैं शहीद परिवारों की करुणामयी सिसकियां। इन शहीद परिवारों के रिसते जख्मों पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं दिखता। जिन्होंने अपने लाडलों को देश की बलिवेदी पर हंसते हंसते न्यौछावर कर दिया, अब सरकार की उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। इन शहीद परिवारों के लिए जंग-ए-आजादी का जश्न बेमानी है...
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सीमावर्ती गांव मराड़ा के लांसनायक बिक्रम दत्त 27 जनवरी 2007 को जम्मू कश्मीर के लेह सेक्टर में पाक सेना से लोहा लेते हुए 26 वर्ष की अल्पायु में शहीद हो गए थे। शहीद लांसनायक बिक्रम दत्त की माता सोमा देवी ने नम आंखों से बताया कि उनके बेटे की हफ्ते बाद शादी थी। वह घर पर बेटे के सेहरे की लड़ियां बुनते हुए शगुनों के गीत गा रही थी, मगर बेटे ने वीरगति को दुल्हन के रुप में गले लगाकर मुझे शहीद की मां का दर्जा दे मेरे अरमानों को भी वतन पर कुर्बान कर दिया। उन्होंने कहा कि बेटे के जाने का उन्हें दुख तो है, मगर उसकी शहादत पर गर्व भी है।  
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सोमा देवी और शहीद के भाई सुरिंदर कुमार ने बताया कि उनके बेटे के अंतिम संस्कार के मौके पर पहुंचे कई राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने उनके बेटे की याद में एक यादगारी गेट व लाइब्रेरी बनाने, स्कूल का नाम शहीद के नाम पर रखने व उनके छोटे बेटे को नौकरी देने की घोषणा की थी, मगर शहादत के 11 साल बाद भी सरकार ने अपने वायदों को मूर्त रुप नहीं दिया। 
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शहीद की मां ने बताया कि उनकी आखिरी इच्छा है कि वह मरने से पहले अपने शहीद बेटे की याद में बना कोई स्मारक देख लें। इतने साल में शासन-प्रशासन का कोई भी अधिकारी उनके परिवार की सुध लेने नहीं आया, सिर्फ शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के सदस्य ही समय समय पर उनका दुख बांटने आते रहते हैं।


इस मौके पर शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविंदर सिंह विक्की ने कहा कि अगर सरकार इन शहीद परिवारों इसी तरह उपेक्षा करती रही तो भविष्य में कोई भी मां अपने बच्चे को सेना में भेजने से पहले कई बार सोचेगी। इसका असर सीमा पर तैनात हमारे वीर जवानों के मनोबल पर पड़ेगा, जो देश की सुरक्षा के लिए ठीक नहीं होगा। सरकार को चाहिए कि शहीद की चिता ठंडी होने के साथ ही अपनी घोषणाओं को अमलीजामा पहनाकर शहीद परिवारों को मनोबल बढ़ाए। 
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