क्यों आंखों के सामने ये मंजर देख भावुक हुईं शबाना आजमी, कहा-कभी नहीं भूलेंगे
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शबाना आजमी अमृतसर पहुंच कर भावुक हो गई। दरअसल, यहां स्थित भारत-पाकिस्तान विभाजन संग्रहालय वो पहुंचीं और इस दौरान वो भावुक नजर आईं। शबाना आजमी ने संग्रहालय में एक घंटा से अधिक समय तक देश विभाजन के दौरान लाखों पंजाबियों के हुए नरसंहार के मंजर की तस्वीरों को देखा।
संग्रहालय में देश विभाजन के दौरान लोगों को किस प्रकार अपने घरों को छोड़कर पलायन करना पड़ा था। सदियों से एक साथ रहने वाले हिंदू-सिखों और मुस्लिमों के बीच हुए धार्मिक उन्माद से फैले दंगों ने लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
संग्रहालय की पहली मंजिल में दर्शाए गए भारत-पाकिस्तान विभाजन को एक दीवार के आरी से किए जा रहे दो टुकड़ों को देख कर शबाना कुछ पल वहां रुकीं। उन्होंने संग्रहालय में रखी उस ट्रेन को भी देखा, जिसमें हजारों लोग कटी हुई लाशों के बीच बैठ कर अमृतसर पहुंचे थे।
संग्रहालय को देख भावुक हुईं शबाना ने कहा कि यह संग्रहालय देश विभाजन की उस मंजर को याद दिलाता है जिसकी पीड़ा को हमारे बुजुर्गों ने कई दशकों तक अपने सीने में छुपा कर रखा। यह संग्रहालय देश विभाजन की डरावनी त्रासदी के आघात का अनुभव करवाता है। संग्रहालय ने देश विभाजन के दौरान लाखों लोगों के साथ जो हुआ, उसे संजो कर रखा हुआ है।
शबाना आजमी ने कहा कि हमें प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि हम विभाजन को कभी नहीं भूलेंगे। इस भयानक त्रासदी को पीछे छोड़ देंगे और धर्म की परवाह किए बिना एकता में मिलकर काम करने के लिए खुद को प्रतिबद्ध करेंगे। विभाजन की पीड़ा याद दिलाने के संग्रहालय के प्रयास सराहनीय है। शबाना ने ‘ट्री ऑफ होप’ के लिए एक नोट में भी कहा कि हमें इस त्रासदी को कभी नहीं भूलना चाहिए।
शबाना आजमी कैफी आजमी की बेटी हैं, जिन्होंने फिल्म ‘गरम है’ की पटकथा लिखी है, जो भारतीय मुसलमानों के विभाजन के बाद की दुर्दशा को पकड़ती है। विभाजन संग्रहालय दुनिया का पहला संग्रहालय है जो 1947 में भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन को समर्पित है। यह विभाजन के इतिहास को बताने के लिए मौखिक इतिहास, व्यक्तिगत कलाकृतियों, पत्रों, तस्वीरों, समाचार पत्रों और अभिलेखीय फुटेज और दस्तावेजों का उपयोग करता है। संग्रहालय अक्तूबर 2016 में खोला गया था।