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अमृतसर में कुएं से मिले 22 शहीदों के अस्थि पिंजर
ब्यूरो/अमर उजाला, अजनाला (अमृतसर)
Updated Sat, 01 Mar 2014 02:31 PM IST
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1857 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में विद्रोह करने वाले 282 भारतीय सैनिकों की हत्या कर अंग्रेजों ने अजनाला के एक कुएं में फेंक दिया था। इनमें 45 सैनिकों को जिंदा ही कुएं में दफन किया गया था।
इस बर्बर और कायराना हरकत के गवाह अजनाला के कुएं से जैसे ही सैनिकों की अस्थियां निकालने का काम शुरू हुआ, मानो 157 साल पुराने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्ने फिर से खुल गए।
हजारों की तादाद में बच्चे, बुढ़े, जवान मौके पर पहुंचने लगे। देशभर से सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और प्रशासनिक अमले के लोग सुबह से ही पहुंच चुके थे।
गुरुद्वारा शहीदगंज और शहीदांवाला खूह कमेटी ने ही उन गुमनाम शहीदों को सम्मान और आजादी दिलाने के उद्देश्य से उनकी अस्थियां निकाल कर विधिवत अंतिम संस्कार करने का फैसला किया था।
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इस मुहिम की शुरुआत अमृतसर के स्कूली बच्चों द्वारा गाए देशभक्ति के गीतों के साथ हुई। शहीदांवाला खूंह कमेटी के महासचिव काबल सिंह शाहपुर ने कहा कि आज का दिन शहीदों को समर्पित किए जाने के कारण कमेटी द्वारा किसी भी राजनीतिक दल को अपने विचार पेश करने का अवसर नहीं दिया गया। शाम पांच बचे तक 22 शहीदों की अस्थियां कुएं से निकाल ली गई थीं।
45 सैनिकों को जिंदा फेंका गया था कुएं में
शोधकर्ता सुरिंदर कोछड़ के अनुसार, 30 जुलाई, 1857 को लाहौर की मियां मीर छावनी से ईस्ट इंडिया कंपनी से बगावत करके बंगाल नेटिव इनफेंटरी की 26 रेजीमेंट के करीब 500 निहत्थे हिंदुस्तानी सिपाही भाग कर अजनाला में दरिया रावी के पास पहुंच गए थे।
वहां गांव के लोगों की मुखबरी पर ब्रिटिश सेना ने उनमें से 218 सिपाहियों की गोली मारकर हत्या कर दी जबकि शेष 282 सैनिकों को अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर फ्रेडरिक हेनरी कूपर रस्सियों से बांधकर अजनाला ले आया। अगली सुबह एक अगस्त को बकरीद के दिन थाने में बंद 282 सैनिकों में से 237 को गोली मार दी गई।
उनके साथ ही जगह की कमी के चलते छोटे से बुर्ज में ठूंस कर भरे 45 सैनिकों को जिंदा ही कुएं में फेंककर कुएं को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। नरसंहार के 157 वर्ष बीत जाने के बाद भी राज्य या केंद्र सरकार ने सैनिकों के शवों या अस्थियों को निकालने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
शहीदों को न कहें ‘काला’
गुरुद्वारा कमेटी के सदस्यों ने कहा कि स्थानीय लोग अज्ञानता के चलते कुएं को अंग्रेजों द्वारा दिए ‘कालियां वाले खूह’ (काले लोगों का कुआं) नाम से संबोधित करते हैं, जो शर्मनाक है। अजनाला में जहां भी शहीदों को ‘काला’ लिखा गया है, उसे वहां से हटाना अजनाला निवासियों का ही दायित्व है।
अजनाला में होगा अस्थियों का अंतिम संस्कार
कमेटी के अध्यक्ष अमरजीत सिंह सरकारिया ने बताया कि आजादी के बाद यहां यादगार के नाम पर ईंटों की एक छोटी सी बुर्जी थी, जिस पर एक कोरा कपड़ा डालकर ‘1857 के शहीद‘ लिखा हुआ था।
अगस्त 1957 में जब पहली बार इस स्थान पर 100 वर्षीय शहीदी दिवस और 2007 में 150 वर्षीय शहीदी समागम करवाए गए।
उन्होंने बताया कि कुएं से निकाली अस्थियों की जरूरी जांच कराने के बाद और सरकार द्वारा शहीदों के संस्कार व उनके समाधि स्मारक के लिए उचित जगह मिलने पर अजनाला में ही इन अस्थियों का संस्कार किया जाएगा।
इसके बाद विशाल जुलूस की शक्ल में अस्थियां जल प्रवाह के लिए श्री गोईंदवाल साहिब और हरिद्वार ले जाई जाएंगी।
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इस बर्बर और कायराना हरकत के गवाह अजनाला के कुएं से जैसे ही सैनिकों की अस्थियां निकालने का काम शुरू हुआ, मानो 157 साल पुराने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्ने फिर से खुल गए।
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हजारों की तादाद में बच्चे, बुढ़े, जवान मौके पर पहुंचने लगे। देशभर से सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और प्रशासनिक अमले के लोग सुबह से ही पहुंच चुके थे।
गुरुद्वारा शहीदगंज और शहीदांवाला खूह कमेटी ने ही उन गुमनाम शहीदों को सम्मान और आजादी दिलाने के उद्देश्य से उनकी अस्थियां निकाल कर विधिवत अंतिम संस्कार करने का फैसला किया था।
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इस मुहिम की शुरुआत अमृतसर के स्कूली बच्चों द्वारा गाए देशभक्ति के गीतों के साथ हुई। शहीदांवाला खूंह कमेटी के महासचिव काबल सिंह शाहपुर ने कहा कि आज का दिन शहीदों को समर्पित किए जाने के कारण कमेटी द्वारा किसी भी राजनीतिक दल को अपने विचार पेश करने का अवसर नहीं दिया गया। शाम पांच बचे तक 22 शहीदों की अस्थियां कुएं से निकाल ली गई थीं।
45 सैनिकों को जिंदा फेंका गया था कुएं में
शोधकर्ता सुरिंदर कोछड़ के अनुसार, 30 जुलाई, 1857 को लाहौर की मियां मीर छावनी से ईस्ट इंडिया कंपनी से बगावत करके बंगाल नेटिव इनफेंटरी की 26 रेजीमेंट के करीब 500 निहत्थे हिंदुस्तानी सिपाही भाग कर अजनाला में दरिया रावी के पास पहुंच गए थे।
वहां गांव के लोगों की मुखबरी पर ब्रिटिश सेना ने उनमें से 218 सिपाहियों की गोली मारकर हत्या कर दी जबकि शेष 282 सैनिकों को अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर फ्रेडरिक हेनरी कूपर रस्सियों से बांधकर अजनाला ले आया। अगली सुबह एक अगस्त को बकरीद के दिन थाने में बंद 282 सैनिकों में से 237 को गोली मार दी गई।
उनके साथ ही जगह की कमी के चलते छोटे से बुर्ज में ठूंस कर भरे 45 सैनिकों को जिंदा ही कुएं में फेंककर कुएं को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। नरसंहार के 157 वर्ष बीत जाने के बाद भी राज्य या केंद्र सरकार ने सैनिकों के शवों या अस्थियों को निकालने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
शहीदों को न कहें ‘काला’
गुरुद्वारा कमेटी के सदस्यों ने कहा कि स्थानीय लोग अज्ञानता के चलते कुएं को अंग्रेजों द्वारा दिए ‘कालियां वाले खूह’ (काले लोगों का कुआं) नाम से संबोधित करते हैं, जो शर्मनाक है। अजनाला में जहां भी शहीदों को ‘काला’ लिखा गया है, उसे वहां से हटाना अजनाला निवासियों का ही दायित्व है।
अजनाला में होगा अस्थियों का अंतिम संस्कार
कमेटी के अध्यक्ष अमरजीत सिंह सरकारिया ने बताया कि आजादी के बाद यहां यादगार के नाम पर ईंटों की एक छोटी सी बुर्जी थी, जिस पर एक कोरा कपड़ा डालकर ‘1857 के शहीद‘ लिखा हुआ था।
अगस्त 1957 में जब पहली बार इस स्थान पर 100 वर्षीय शहीदी दिवस और 2007 में 150 वर्षीय शहीदी समागम करवाए गए।
उन्होंने बताया कि कुएं से निकाली अस्थियों की जरूरी जांच कराने के बाद और सरकार द्वारा शहीदों के संस्कार व उनके समाधि स्मारक के लिए उचित जगह मिलने पर अजनाला में ही इन अस्थियों का संस्कार किया जाएगा।
इसके बाद विशाल जुलूस की शक्ल में अस्थियां जल प्रवाह के लिए श्री गोईंदवाल साहिब और हरिद्वार ले जाई जाएंगी।