चंडीगढ़: बच्चों को क्रेच में भेजने से पहले कर लें बाल सहायिकाओं की पड़ताल, शहर के 50 क्रेच में 1600 बच्चे हैं पंजीकृत
चंडीगढ़ शहर में 50 क्रेच बाल कल्याण परिषद की ओर से चलाए जा रहे हैं। 1600 से अधिक बच्चे यहां पंजीकृत हैं। विशेषज्ञों की राय है कि बाल सहायिकाओं के स्वभाव पर बच्चों का भविष्य टिका होता है। कामकाजी माता-पिता क्रेच में भेजने से पहले बाल सहायिकाओं की पड़ताल जरूर कर लें। अच्छे स्वभाव वाला बच्चा जल्दी ग्रोथ करता है।
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नौकरी के साथ बच्चों की देखभाल आसान नहीं, इसलिए चंडीगढ़ के लोग क्रेच का सहारा ले रहे हैं। हालांकि मनोचिकित्सकों की राय है कि अभिभावक क्रेच में बच्चे को दाखिल करने से पहले यह जरूर देख लें कि वहां सुविधाएं कैसी हैं और बच्चों की देखभाल करने वाली बाल सहायिकाएं कैसी हैं। बाल सहायिकाओं के स्वभाव पर ही आपके बच्चे का विकास टिका होगा। यदि बाल सहायिकाओं से प्यार-दुलार मिलता है, तो बच्चे का दिमागी विकास ठीक तरह से होगा अन्यथा विपरीत असर पड़ेगा। इससे बाद में दिक्कतें आ सकती हैं। हालांकि कोरोना में बंद क्रेच अभी खुले नहीं हैं।
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सुबह आठ बजे खुल जाते हैं क्रेच
शहर में 50 क्रेच हैं, जिनका संचालन भारतीय बाल कल्याण परिषद की ओर से किया जाता है, जिसका कार्यालय बाल भवन सेक्टर-23 में है। भारतीय बाल कल्याण परिषद को समाज कल्याण विभाग संचालित करता है। इन क्रेच में कामकाजी परिवारों के 1600 से अधिक बच्चे पंजीकृत हैं। क्रेच में छह माह से लेकर 12 वर्ष तक के बच्चों को रखा जाता है, समय सुबह साढ़े आठ से शाम साढ़े पांच बजे तक का है, लेकिन कर्मचारी तब तक इंतजार करते हैं, जब तक कि बच्चों के माता-पिता या परिजन उन्हें लेने नहीं आ जाते।
100 से 600 रुपये तक है शुल्क
समाज कल्याण विभाग के अधिकारी केहर सिंह का कहना है कि बच्चों को संभालने के लिए हर क्रेच में बाल सेविकाएं हैं। उनके साथ दो सहायिकाएं होती हैं, जो बच्चों की देखभाल करती हैं। इन्हें भी समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि बच्चों की देखरेख सही तरीके से हो सके। क्रेच में बच्चों को रखने का शुल्क 100 से लेकर 600 रुपये तक प्रति महीना है। इसकी निगरानी चाइल्ड वेलफेयर ऑफिसर (सीसीडब्ल्यूओ) द्वारा की जाती है। विभाग के पास दो सीडब्ल्यूओ हैं, जिनके पास 25-25 क्रेच हैं। हर क्रेच में किचन है, ताकि बच्चों को गर्म दूध और खाना दिया जा सके। बच्चों के खेलने और आराम करने के लिए अलग से व्यवस्था है।
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बच्चों की होती है स्वास्थ्य जांच
केहर सिंह ने बताया कि समय-समय पर बच्चों की स्वास्थ्य जांच भी होती है। स्टाफ को नियमित प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें बच्चों के दांत आने पर क्या करना है, खाना किस प्रकार खिलाना है, बुखार होने पर उन्हें किस प्रकार संभालना है, छह माह के बच्चे को किस प्रकार संभालना है आदि का प्रशिक्षण शामिल है। बच्चों के लिए पालने की भी व्यवस्था है। जरूरत पड़ने पर बच्चों के परिजन वीडियो कॉल करके अपने बच्चे को देख भी सकते हैं। क्रेच के संचालन के लिए समाज कल्याण विभाग की ओर से फंड मुहैया कराया जाता है।
ऑनलाइन शुल्क देने की भी व्यवस्था
केहर सिंह ने बताया कि अब परिजन ऑनलाइन शुल्क भर सकते हैं। इसके लिए सॉफ्टवेयर तैयार किया जा रहा है। महीने के अंतिम कार्य दिवस पर बाल सेविकाओं की बैठक होती है, जिसमें समस्याओं का समाधान होता है।
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मनोचिकित्सक की राय
जन्म के बाद दो वर्ष तक का समय बच्चों के विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान ही बच्चों का दिमागी विकास होता है। यह विकास इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चा किस परिवेश में रह रहा है और उसकी परवरिश किस तरह हो रही है। घर में जो बड़े लोग हैं, उससे किस प्रकार का व्यवहार करते हैं, उनकी प्रतिक्रिया किस प्रकार की है, यह नोटिस होता है। बेहतर माहौल में बच्चा अच्छी ग्रोथ करता है। यदि माता-पिता कामकाजी हैं और बच्चों को क्रेच में छोड़ते हैं, तो पहले बाल सहायिकाओं के बारे में जरूर जानें। क्योंकि बाल सहायिकाओं का व्यवहार बच्चे से मिलता-जुलता होना चाहिए।
-डॉ. सतीश थापर, मनोचिकित्सक
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सभी क्रेच में प्रशिक्षित स्टाफ है, ताकि वह बच्चों की सही तरीके से देखभाल कर सकें। हमारी कोशिश रहती है कि इन बच्चों को अच्छे तरीके से रखें। क्रेच में बच्चों के लिए सभी सुविधाएं हैं, जो उन्हें घरों पर मिलती हैं।
- नवजोत कौर, निदेशक, समाज कल्याण विभाग, चंडीगढ़