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15 करोड़ खर्च उस पर जिसका कोई फायदा नहीं
राजेश ढल्ल
Updated Mon, 11 Nov 2013 01:50 PM IST
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सेक्टर-17 में नए बने ओवरब्रिज को शहर के ऐसे स्थान का खिताब दिया जा सकता है, जहां दिन में भी सबसे अधिक सन्नाटा रहता है।
नगर निगम ने इसके निर्माण पर 15 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसके निर्माण इधर की सड़क करीब डेढ़ साल बंद रही और इस तरफ से जाने की लोगों की आदत ही छूट गई।
सड़क बंद रहने पर भी यहां कभी जाम नहीं लगा तो पुल के बनने से क्या होगा। सब यही सवाल पूछ रहे हैं कि इस पुल की क्या उपयोगिता है और यह क्यों बनाया गया?
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इस पुल के निर्माण पर सवाल उठाए हैं। प्रशासन से पूछा गया है कि इसके निर्माण से चंडीगढ़ के ट्रैफिक कंजेक्शन में क्या कमी आई है।
उद्घाटन के दस दिन बाद हाल
इस ओवर ब्रिज का लोकार्पण एक मई को किया गया और इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया। उद्घाटन के दस दिन बाद भी इस पर चलने वालों की संख्या नाममात्र है। रविवार की दोपहर भी और दिन से अलग नहीं थी। दोपहर 12 बजे से एक बजे के बीच एक घंटे में यहां से मात्र आठ वाहन गुजरे।
साठ हरे-भरे पेड़ काटे गए थे
इस ओवर ब्रिज के निर्माण के लिए पिछले साल प्रशासन ने 60 हरे-भरे पेड़ भी काटे थे। इन्हें बचाने के लिए सेव-60 चिपको अभियान चला रहे तीन लोगों को पेड़ों को काटते वक्त विरोध करने पर गिरफ्तार भी किया गया था।
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55 साल पुराना प्लान
इस ओवर ब्रिज को बनाने का प्लान 1958 में ली-कार्बूजिए ने बनाया था। इसकी उपयोगिता न देखते हुए यह प्रस्ताव लंबे समय से ठंडे बस्ते में था। करीब 55 साल बाद इसे ठंडे बस्ते से निकाल कर इस पर अमल किया गया।
शहर के बुद्धिजीवियों और प्लाजा के व्यावसियों ने भी इसे गैर-जरूरी बताते हुए, निर्माण के समय इसका विरोध किया था।
जहां तेजी की जरूरत वहां प्रशासन सुस्त
प्रशासन ने ओवर ब्रिज का निर्माण तो डेढ़ साल में कर दिया मगर इसके साथ ही टीडीआई माल के पिछली ओर नए प्लाजा का निर्माण छह साल से लटका है। इसकी निर्माण अवधि दो साल थी।
इसे चार साल पहले तैयार हो जाना चाहिए था। इसका निर्माण अटकने से सेक्टर-17 ए,बी और सी के व्यापारियों के कारोबार भी चौपट हो रहा है।
विरोध में तर्क : पैसों की बर्बादी
युवा धरती संगठन के पदाधिकारी अंशुमन ने कहा कि ओवरब्रिज के निर्माण की जरूरत मध्यमार्ग पर थी। सेक्टर-17 में इसकी कोई जरूरत नहीं थी।
इसलिए हमने विरोध किया था। जब पेड़ काटे जा रहे थे तो हमारे संगठन के लोगों ने चिपको आंदोलन किया था। प्रशासन ने मनमानी दिखाते हुए जनता के पैसे से इसका निर्माण किया।
उन कार्यों पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं जिनकी कोई जरूरत नहीं है। ओवरब्रिज के निर्माण के कारण ताज से केसी सिनेमा को जाने वाली सड़क बंद की गई लेकिन बंद करने के बावजूद सेक्टर-17 के भीतर जाम की कोई दिक्कत नहीं दिखी। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस ब्रिज को बनाना सिर्फ पैसे की बर्बादी थी।
ओवर ब्रिज के निर्माण में धन और समय लगाने से अच्छा था कि नए प्लाजा का निर्माण समय पर किया जाता। छह साल से यह प्रोजेक्ट अटका है। शाम सात बजे के बाद यहां अंधेरा छा जाता है। इस वजह से इस तरफ का कारोबार चौपट हो रहा है।
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नगर निगम ने इसके निर्माण पर 15 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसके निर्माण इधर की सड़क करीब डेढ़ साल बंद रही और इस तरफ से जाने की लोगों की आदत ही छूट गई।
सड़क बंद रहने पर भी यहां कभी जाम नहीं लगा तो पुल के बनने से क्या होगा। सब यही सवाल पूछ रहे हैं कि इस पुल की क्या उपयोगिता है और यह क्यों बनाया गया?
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इस पुल के निर्माण पर सवाल उठाए हैं। प्रशासन से पूछा गया है कि इसके निर्माण से चंडीगढ़ के ट्रैफिक कंजेक्शन में क्या कमी आई है।
उद्घाटन के दस दिन बाद हाल
इस ओवर ब्रिज का लोकार्पण एक मई को किया गया और इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया। उद्घाटन के दस दिन बाद भी इस पर चलने वालों की संख्या नाममात्र है। रविवार की दोपहर भी और दिन से अलग नहीं थी। दोपहर 12 बजे से एक बजे के बीच एक घंटे में यहां से मात्र आठ वाहन गुजरे।
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साठ हरे-भरे पेड़ काटे गए थे
इस ओवर ब्रिज के निर्माण के लिए पिछले साल प्रशासन ने 60 हरे-भरे पेड़ भी काटे थे। इन्हें बचाने के लिए सेव-60 चिपको अभियान चला रहे तीन लोगों को पेड़ों को काटते वक्त विरोध करने पर गिरफ्तार भी किया गया था।
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55 साल पुराना प्लान
इस ओवर ब्रिज को बनाने का प्लान 1958 में ली-कार्बूजिए ने बनाया था। इसकी उपयोगिता न देखते हुए यह प्रस्ताव लंबे समय से ठंडे बस्ते में था। करीब 55 साल बाद इसे ठंडे बस्ते से निकाल कर इस पर अमल किया गया।
शहर के बुद्धिजीवियों और प्लाजा के व्यावसियों ने भी इसे गैर-जरूरी बताते हुए, निर्माण के समय इसका विरोध किया था।
जहां तेजी की जरूरत वहां प्रशासन सुस्त
प्रशासन ने ओवर ब्रिज का निर्माण तो डेढ़ साल में कर दिया मगर इसके साथ ही टीडीआई माल के पिछली ओर नए प्लाजा का निर्माण छह साल से लटका है। इसकी निर्माण अवधि दो साल थी।
इसे चार साल पहले तैयार हो जाना चाहिए था। इसका निर्माण अटकने से सेक्टर-17 ए,बी और सी के व्यापारियों के कारोबार भी चौपट हो रहा है।
विरोध में तर्क : पैसों की बर्बादी
युवा धरती संगठन के पदाधिकारी अंशुमन ने कहा कि ओवरब्रिज के निर्माण की जरूरत मध्यमार्ग पर थी। सेक्टर-17 में इसकी कोई जरूरत नहीं थी।
इसलिए हमने विरोध किया था। जब पेड़ काटे जा रहे थे तो हमारे संगठन के लोगों ने चिपको आंदोलन किया था। प्रशासन ने मनमानी दिखाते हुए जनता के पैसे से इसका निर्माण किया।
उन कार्यों पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं जिनकी कोई जरूरत नहीं है। ओवरब्रिज के निर्माण के कारण ताज से केसी सिनेमा को जाने वाली सड़क बंद की गई लेकिन बंद करने के बावजूद सेक्टर-17 के भीतर जाम की कोई दिक्कत नहीं दिखी। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस ब्रिज को बनाना सिर्फ पैसे की बर्बादी थी।
ओवर ब्रिज के निर्माण में धन और समय लगाने से अच्छा था कि नए प्लाजा का निर्माण समय पर किया जाता। छह साल से यह प्रोजेक्ट अटका है। शाम सात बजे के बाद यहां अंधेरा छा जाता है। इस वजह से इस तरफ का कारोबार चौपट हो रहा है।