मां दुर्गा और भारतीय परंपरा में शक्ति की उपासना सीधे तौर पर प्रकृति, पर्यावरण और जीवन के संतुलन से जुड़ी हुई है इस संदेश के साथ मंगलवार को श्री काशी विश्वनाथ धाम से नमामि गंगे ने पर्यावरण संरक्षण का आह्वान किया । बाबा दरबार में प्रतिष्ठित भारत माता की प्रतिमा के सम्मुख दुर्गा स्वरूपा माताओं - बहनों ने भगवती जगदंबा के प्रकृति संरक्षण के संदेश को अपनाने की अपील की। नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक व नगर निगम के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर राजेश शुक्ला ने लोगों को जागरुक करते हुए कहा कि मां दुर्गा की पूजा और नवरात्रि का पर्व हमें प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण का गहरा संदेश देता है दुर्गा पूजा के दौरान नौ प्रकार के पौधों और पत्तों (केला, कर्चुवी, हल्दी, जयन्ती, बिल्व, दाड़िम, अशोक, मान और धान) से 'नवापत्रिका' का निर्माण और पूजन होता है, जो कृषि, वनस्पतियों और प्रकृति के पुनर्जीवन का प्रतीक है। गंगा सेवक राजेश शुक्ला ने बताया कि नवरात्र का पर्व हमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण और नदियों की स्वच्छता का संदेश देता है। मां दुर्गा की प्रतिमाएं पारंपरिक रूप से तालाबों और नदियों की शुद्ध मिट्टी से बनाई जाती हैं, और विसर्जन के बाद यह मिट्टी वापस प्रकृति में मिल जाती है। उन्होंने कहा कि मां दुर्गा का सिंह पर सवार होना और उनके पूरे परिवार (शिवजी का नंदी बैल, कार्तिक जी का मोर, और गणेश जी का चूहा) के साथ होना यह सिखाता है कि जीव किस तरह प्रकृति में संतुलन बनाकर एक साथ रह सकते हैं। दुर्गा सप्तशती के श्लोक "या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति-रूपेण संस्थिता" में भी यह बताया गया है कि देवी समस्त प्राणियों में प्रकृति के रूप में विराजमान हैं। प्रकृति की आराधना के दौरान प्रमुख रूप से सौम्या पांडेय, अनु यादव, भावना विश्वकर्मा, शिवानी तिवारी, वर्षा जायसवाल आदि रहीं।