शायर स्वयं श्रीवास्तव के तेवर और व्यंग्य युवा कवि स्वयं श्रीवास्तव ने अपनी रचनाओं और कनपुरिया अंदाज से माहौल में ऊर्जा भर दी। उन्होंने सामाजिक सरोकारों से लेकर पौराणिक संदर्भों पर बेबाक प्रस्तुतियां दीं। अनारकली और सलीम पर मर्मस्पर्शी पंक्तियां प्रेम करने चली तो उसे भी वही जो महज थी कहानी सुना दी गई, नर्तकी एक अकबर के दरबार में कैसे दीवार में चुना दी गई एक अपराध में दोनों शामिल रहे, किंतु चांदी की चम्मच रिहा हो गई, आपका इश्क कैसा सलीम, आपके सामने आखिरी ईंट रख दी गई...सुनाकर तालियां बटोरीं। घर छोड़ने के दर्द को महसूस कराया कि मुश्किल थी संभलना ही पड़ा घर के वास्ते फिर घर से निकालना ही पड़ा, मजबूरियों का नाम हमने शौक रख लिया फिर शौक ही बदल लिए घर के वास्ते सुनाया। आगामी जेनजी और जेन अल्फा के विरोध प्रदर्शन को कविता में सुनाया कि ऐसा नहीं की सारा फलक मांग रहे हैं। हम सिर्फ अपने हिस्से का हक मांग रहे हैं, सरकार तुम चलाओ हमको नौकरी तो दो, रोटी के लिए बस थोड़ा नमक मांग रहे हैं।