28 दिसंबर वर्ष 1996 के लखनऊ अधिवेशन में दो पत्रकार महात्मा गांधी से मिले। दोनों की उम्र 25-26 वर्ष के बीच थी। उस वक्त गांधी जी चक्की पीस रहे थे। युवक चौंके, इतना बैरिस्टर और नेता चक्की पीसे। बहरहाल, कुछ देर देखने के बाद एक युवक ने निवेदन वाले अंदाज में गांधी जी कहा कि आप कानपुर आइये। यह सुनकर वह बोले कि हां, हां, कानपुर के तो और भी भाई मेरे पास आए थे। उनसे मैंने कहा कि "प्रताप" का संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी आवे तो बात करके जवाब दूंगा। अब मैं कानपुर जरूर आऊंगा पर मैं तुम्हारे पास ही ठहरूंगा। गांधी जी की इस बात पर युवक कुछ सोचने लगा। फिर कहा कि मेरे छापेखाने में तो धूल उड़ती है। हम कानपुर के लोग आपको बहुत अच्छी जगह ठहराएंगे। गांधी जी खिलखिलाकर बोले- भाई मुझे अच्छी जगह नहीं ठहरना है। मुझे तुम्हारे पास ही ठहरना है। अच्छा जाओ, देर हो रही है। उसी समय दोनों युवक उठकर चले गए। गांधी जी को कानपुर आने का निमंत्रण देने वाले युवक थे, गणेश शंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी। चौथे दिन 1 जनवरी 1917 को माखनलाल चतुर्वेदी "प्रताप" प्रेस पहुँचे तो देखा - गांधी जी वहां बैठे हैं। वह उस समय पत्र लिखने मे व्यस्त थे। एक साधारण सी कलम थी, आलपिन की जगह बबूल के कांटे रखे हुए थे। प्रताप प्रेस के नल पर उनके कपड़े धुल रहे थे। लोगों से मिलने का समय होते ही उन्होने अपना लिखना बंद कर दिया। फिर बात करने लगे। गणेश शंकर विद्यार्थी सवाल करते, गांधी जी जवाब देते। साथ में थे कानपुर के थियोसाफिकल हाईस्कूल के हेडमास्टर परांजपे। वह भी बीच बीच में गांधी जी से सवाल करते और वह उनके सवालों का भी जवाब देते रहे। कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप कुमार शुक्ला ने बताया कि गांधी जी की कानपुर सात यात्राएं हुई हैं। ये सभी यात्राएं वर्ष 1916 और 1934 के बीच हुईं। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी जी इलाहाबाद से लाहौर जाते हुए कानपुर में दूसरी बार 21 जनवरी 1920 में आए। तीसरी बार 14 अक्टूबर 1920, चौथी बार 9 अगस्त 1921, पांचवीं बार 23 दिसंबर 1925 और छठवीं बार 18 दिसंबर 1929 और सातवीं बार 26 जुलाई 1934 को कानपुर आए थे।