फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Shimla News ›   Expert Advice Dr SP Bhardwaj etheral use for fruit ripening is not good for health

विशेषज्ञ की सलाह: प्राकृतिक रूप से पकने दें फल, इथरल का इस्तेमाल सही नहीं

Mon, 22 Jul 2019 12:41 PM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Mon, 22 Jul 2019 12:41 PM IST
विज्ञापन
Expert Advice Dr SP Bhardwaj etheral use for fruit ripening is not good for health
डा. एसपी भारद्वाज, पूर्व निदेशक, विस्तार, डा. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी सोलन - फोटो : अमर उजाला

गत वर्षों से सेब बगीचों में अप्राकृतिक रूप से इथरल की स्प्रे करने का प्रचलन आवश्यकता से अधिक बढ़ा है। सेब के फलों का रंग लाल करने के लिए ही यह प्रचलन बढ़ गया है। इसका कारण मंडियों में लाल रंग के सेब की मांग का होना है। अधिक रंग की चाहत में सेब बागवान इसका अधिक मात्रा में प्रयोग करते हैं। इससे बागवान सेब के फलों के अच्छे दाम भी प्राप्त कर लेते हैं।

विज्ञापन


उपभोक्ता भी अधिक रंगों वाले फलों की भूल-भुलैया में फंस रहे हैं। वे प्राकृतिक रंग को खारिज कर रहे हैं। ऐसा करना अवांछनीय और अनावश्यक होता है। प्राकृतिक रूप से पके हुए फल पौष्टिक, अच्छी भंडारण क्षमता वाले और पोषण तत्वों से भरपूर होेते हैं। ये अत्यंत स्वादिष्ट होते हैं। जो विभिन्न आवश्यक तत्वों जैसे विटामिन, फाइबर आदि की आपूर्ति करके निरोग रखते हैं।
विज्ञापन


सेब के फलों में पर्याप्त प्राकृतिक रंगों के नहीं आने का कारण पौधों का आवश्यकता के अनुरूप विकास नहीं होना, पौधों में आपसी दूरी कम होना, अधिक फल लगने के कारण टहनियों की आपसी दूरी का कम होना, समर प्रूनिंग न करना, कम रंग वाली किस्में लगाना, हवा के आदान-प्रदान में कमी होना, प्रकाश का पौधों के भीतरी भाग में कम पहुंचना, नत्रजन उर्वरक का अत्यधिक उपयोग करना, तौलिए में खर-पतवार का सफाई न करना, पोटाश, मैगनिशियम और कैल्शियम की कमी होना भी है। बगीचे की समुद्र तल से ऊंचाई के हिसाब से सेब की किस्मों का चयन जरूरी होता है। इसके लिए निचले क्षेत्रों में अधिक रंग वाली किस्में ही लगाई जानी चाहिए। ऊपरी क्षेत्रों में कम रंग वाली किस्में लगाने से इस समस्या का समाधान हो सकता है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


जहां प्रयत्न करने के बाद भी रंग नहीं आ रहा है, सेब के केवल उन्हीं बगीचों में इथरल का प्रयोग करने का चलन है। वह भी तब जब फलों में कम से कम 30 प्रतिशत तक प्राकृतिक रंग आ जाए। इसकी स्वीकृत मात्रा यानी 500 से 600 ग्राम मिलीलीटर प्रति 200 लीटर के ड्रम में डाली जाती है। इसमें किसी अन्य घोल को मिलाना वर्जित है। केवल प्लेनोफिक्स या इसी साल्ट की दवा को 45 मिलीलीटर प्रति 200 लीटर पानी में डालना चाहिए। इससे फल नहीं झड़ते। 

यहां यह बता देना जरूरी है कि इथरल के प्रयोग से फलों में रंग विकास के साथ-साथ पत्तियां भी समय पूर्व पीली हो जाती हैं। इसके कारण बीमों का प्रर्याप्त विकास नहीं हो पाता है। अगले वर्ष बीमों पर कमजोर फूल और फल बनते हैं। पौधों में धीरे-धीरे फलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बहुत कम फल लग पाते हैं। इस पहलू पर हर सेब बागवान ध्यान ही नहीं देते हैं।

इसकेे लगातार प्रयोग से फलों का स्वाद हल्का और कड़वा भी होने लगता है। कुछ समय के बाद ही फल सड़ने लगते हैं। उनकी शेल्फ लाइफ प्रभावित होती है। ऐसे फलों का भंडारण नहीं किया जा सकता है। इसके छिड़काव से पौधों मेें हरित पदार्थ क्लोरोफिल का विघटन भी शुरू हो जाता है। बीमों को पत्तियों द्वारा बनाए गए भोजन की ठीक से प्राप्ति नहीं हो पाती है।  


इथरल हारमोन फलों में प्राकृतिक रूप से तभी विकसित होना शुरू होता है, जब विकास लगभग पूरा हो गया हो। यह धीरे-धीरे फलों के स्टार्च को शर्करा में बदलता है। इसकी 0.1 से 1.0 पीपीएम मात्रा जो बहुत कम होती है, ही प्रभावकारी है जो फलों को आकर्षक, स्वादिष्ट और गुणवत्ता वाला बनाती है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस रसायन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई हुई है। एफ एसएसएआई एक्ट 2006 के नियम 2011 के तहत भी किसी भी प्रकार से प्राकृतिक रूप से पकाए गए फलों पर प्रतिबंध है। 
- डा. एसपी भारद्वाज, पूर्व निदेशक, विस्तार, डा. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी सोलन।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed