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विशेषज्ञ की सलाह: सेब की सघन खेती से तीसरे वर्ष 15 से 20 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर लें उत्पादन
Mon, 15 Jul 2019 01:19 PM IST
अरविन्द ठाकुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सोलन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सोलन
Published by: अरविन्द ठाकुर
Updated Mon, 15 Jul 2019 01:19 PM IST
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डॉ. जेएन शर्मा, निदेशक अनुसंधान, डॉ. यशवंत सिंह परमार विश्वविद्यालय नौणी (सोलन)
- फोटो : अमर उजाला
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डॉ. वाईएस परमार उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय का फल विज्ञान विभाग एम 9 रूट स्टॉक्स पर सेब के उच्च घनत्व वाले पौधरोपण में अलग-अलग कैनोपी विकास प्रणालियों का मूल्यांकन कर रहा है। प्रारंभिक अध्ययनों के परिणामों से पता चला है कि टॉल स्पिंडल प्रणाली जलवायु परिस्थितियों में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है और एम 9 रूट स्टॉक्स पर रोपण के तीसरे वर्ष के बाद प्रति हेक्टेयर 15 से 20 मीट्रिक टन की उत्पादकता दे रही है।
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द्विविमीय कैनोपी विकास प्रणालियां फ्रांस में 1800 के दशक में अंगूर के लिए विकसित की गई थीं। हालांकि, इस प्रणाली का उपयोग सेब में मल्टी लीडर कैनोपी डेवलपमेंट के लिए भी किया जाता है। इस प्रणाली की सिफारिश करने से पहले इसका मूल्यांकन और राज्य की विभिन्न ऊंचाई या जलवायु परिस्थितियों में परीक्षण किया जाना चाहिए।
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इस प्रणाली में कैनोपी के अधिक संपर्क के कारण गर्म क्षेत्रों के लिए शायद उपयुक्त न हो और कैंकर या सनबर्न की समस्या पैदा हो सकती है। जहां तक, एफओपीएस की बात है, यह पेड़ों के प्रशिक्षण की एक प्रणाली नहीं है, बल्कि यह फ्यूचर ऑर्चर्ड प्लांटिंग सिस्टम है और न्यूजीलैंड में उच्च घनत्व रोपण प्रणालियों का उपयोग करके उत्पादकता बढ़ाने के लिए और गुयोट तथा कॉर्डन जैसी विभिन्न प्रशिक्षण प्रणालियों को अपनाने के लिए अनुसंधान का एक कार्यक्रम है। इसकी व्यवहार्यता इस देश में भी स्थापित की जानी है। यहां सूर्य की किरणों की तीव्रता अलग है।
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विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान एवं जल प्रबंधन विभाग ने सिंचाई और पोषक तत्वों के प्रबंधन के अध्ययन के लिए एम 9 रूट स्टॉक पर उगाई गई किस्म रेड विलॉक्स के साथ काम शुरू किया है। फील्ड में प्रयोग किए जा रहे हैं, जिसमें ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन ट्रीटमेंट को पोषक तत्वों की खुराक के साथ यानी 35:17.5: 35 ग्राम / वृक्ष / वर्ष (एन:पी2ओ5:के2ओ) के साथ किए जा रहे हैं। इसी खुराक का परीक्षण पारंपरिक विधि के माध्यम से भी किया जा रहा है। अध्ययन प्रभावी परिणामों के साथ आगे बढ़ रहा है। लेकिन पोषक तत्वों के प्रबंधन के लिए राज्य के बागवानों के लिए ठोस सिफारिशें 2-3 वर्षों के लिए अनुसंधान के बाद दी जाएंगी।
- लेखक डॉ. जेएन शर्मा, निदेशक अनुसंधान, डॉ. यशवंत सिंह परमार विश्वविद्यालय नौणी (सोलन)