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चेरी से कमाई करने वालों के चेहरे लटके
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एक तो गंगोत्री यात्रा ठप, उस पर मौसम की मार। ऐसे में रसीली चेरी के सहारे अच्छा मुनाफा कमाने की चाह रखने वाले किसानों के चेहरे लटक गए हैं। बीते साल धराली के गांव वालों ने घर के पास से गुजर रहे गंगोत्री हाईवे के किनारे ही यात्रियों को तीन सौ रुपये प्रति किलो की दर से चेरी बेचकर अच्छा मुनाफा कमाया था, लेकिन इस दफा वीरानी है।
बिना किसी दवा-खाद जंगली अवस्था में ही 45-50 दिन में तैयार होने वाला चेरी गंगोत्री घाटी में अच्छी पैदावार दे रहा है। रूटस्टाक से तैयार पौधे से दूसरे साल और बीजू पौधे से तीसरे साल में फल देने वाली चेरी की बागवानी हर्षिल घाटी के गांवों में की जा रही है।
आलम यह है कि मुख्य रूप से सेब की बागवानी के लिए पहचान बनाने वाली हर्षिल घाटी के धराली गांव में करीब हर परिवार ने चेरी की बागवानी शुरू कर दी है। हिमाचल से पौध लाकर क्षेत्र में चेरी बागवानी के विकास से जुड़े सचेंद्र पंवार बताते हैं कि सेब में तो वर्षभर मेहनत करनी पड़ती है, जबकि चेरी कम मेहनत में ही अच्छा फल दे रही है। इसके लिए न तो दवा कीटनाशक की जरूरत है और न ही खाद की।
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फूल आने से लेकर फल तुड़ान की अवधि महज 50 दिन है। फल आने पर 15 दिन तक चींटी, तोता, कौआ आदि से रखवाली करनी पड़ती है। काश्तकारों का कहना है कि यदि हमारे ऊंचाई वाले क्षेत्रों के अलावा मध्य ऊंचाई में तैयार होने वाली चेरी की पौध उपलब्ध हो तो लोग इसकी बागवानी से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
चेरी की पौध रूट स्टॉक तथा बीज से तैयार होती है। जिले में औद्यानिकी के अंतर्गत आने वाला 80 प्रतिशत भूभाग मध्य ऊंचाई वाला है, जो चेरी उत्पादन के लिए उपयुक्त है। अभी तक इसकी बागवानी की योजना नहीं बनी है।
-एनके सिंह, सहायक उद्यान अधिकारी उत्तरकाशी।
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बिना किसी दवा-खाद जंगली अवस्था में ही 45-50 दिन में तैयार होने वाला चेरी गंगोत्री घाटी में अच्छी पैदावार दे रहा है। रूटस्टाक से तैयार पौधे से दूसरे साल और बीजू पौधे से तीसरे साल में फल देने वाली चेरी की बागवानी हर्षिल घाटी के गांवों में की जा रही है।
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आलम यह है कि मुख्य रूप से सेब की बागवानी के लिए पहचान बनाने वाली हर्षिल घाटी के धराली गांव में करीब हर परिवार ने चेरी की बागवानी शुरू कर दी है। हिमाचल से पौध लाकर क्षेत्र में चेरी बागवानी के विकास से जुड़े सचेंद्र पंवार बताते हैं कि सेब में तो वर्षभर मेहनत करनी पड़ती है, जबकि चेरी कम मेहनत में ही अच्छा फल दे रही है। इसके लिए न तो दवा कीटनाशक की जरूरत है और न ही खाद की।
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फूल आने से लेकर फल तुड़ान की अवधि महज 50 दिन है। फल आने पर 15 दिन तक चींटी, तोता, कौआ आदि से रखवाली करनी पड़ती है। काश्तकारों का कहना है कि यदि हमारे ऊंचाई वाले क्षेत्रों के अलावा मध्य ऊंचाई में तैयार होने वाली चेरी की पौध उपलब्ध हो तो लोग इसकी बागवानी से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
चेरी की पौध रूट स्टॉक तथा बीज से तैयार होती है। जिले में औद्यानिकी के अंतर्गत आने वाला 80 प्रतिशत भूभाग मध्य ऊंचाई वाला है, जो चेरी उत्पादन के लिए उपयुक्त है। अभी तक इसकी बागवानी की योजना नहीं बनी है।
-एनके सिंह, सहायक उद्यान अधिकारी उत्तरकाशी।