{"_id":"62b34c098cd7121fa211b9da","slug":"there-is-silence-in-this-temple-even-in-the-flood-of-travel-rudrapryag-news-drn4152982180","type":"story","status":"publish","title_hn":"मां गौरी, भगवान शिव के दर्शनों को पहुंच रहे श्रद्धालु, गणेश के मंदिर में सन्नाटा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मां गौरी, भगवान शिव के दर्शनों को पहुंच रहे श्रद्धालु, गणेश के मंदिर में सन्नाटा
विज्ञापन
बाबा केदार के दर्शनों को केदारनाथ पहुंच रहे श्रद्धालुओं की नजरों से मुनकटिया गणेश मंदिर आज भी ओझल है। हाईवे से बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर स्थित मंदिर में यात्राकाल में अभी तक एक भी श्रद्धालु नहीं पहुंचा है। इसी स्थान पर भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेश का सिर काट दिया था। यहां गणेश की सिर कटी मूर्ति विराजमान है।
रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राजमार्ग पर सोनप्रयाग से दो किमी आगे मुनकटिया गांव है, जहां पर गणेश भगवान का प्राचीन मंदिर है। मंदिर में पूजा-अर्चना व देखरेख की जिम्मेदारी स्थानीय गोस्वामी परिवार निभा रहे हैं, लेकिन शासन व बीकेटीसी की ओर से मंदिर को पहचान दिलाने के लिए कोई प्रयास नहीं हो पाए हैं। स्थिति यह है कि सोनप्रयाग से दो किमी आगे हाईवे से बमुश्किल सौ मीटर ऊपर इस मंदिर में अभी तक एक भी श्रद्धालु नहीं पहुंचा है। यहां यात्रा के सैलाब में भी सन्नाटा पसरा हुआ है। स्थानीय निवासी दीघार्यु प्रसाद गोस्वामी का कहना है श्रीबदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की ओर से मंदिर के संरक्षण, प्रचार-प्रचार और यात्रा से जोड़ने के लिए पहल नहीं की जा रही है, जबकि गौरीकुंड से केदारनाथ तक आराध्य मां भगवती गौरी, भगवान गणेश और भगवान आशुतोष के मंदिर हैं, लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव में यात्री मुनकटिया पहुंचते ही नहीं हैं। पूर्व में बीकेटीसी को मंदिर के संरक्षण के लिए पत्र भी भेजे गए थे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
यह है मुनकटिया की मान्यता
शिव पुराण के अनुसार इसी स्थान पर भगवान शिव ने त्रिशूल से अपने पुत्र गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया था। कारण, माता पार्वती ने गणेश को यह कहकर वहां पर बिठा दिया था कि वह अंदर कक्ष में स्नान कर रही हैं, इसलिए वहां कोई न आए। तभी भगवान शिव वहां पहुंच गए और अंदर जाने लगे। इस पर गणेश ने उन्हें माता की आज्ञा का हवाला देकर रोक दिया। इस पर शिव क्रोधित हो गए और गुस्से में त्रिशूल से अपने पुत्र का सिर काट दिया। बाद में गणेश के शरीर पर नन्हे हाथी का सिर जोड़ा गया, जिससे उन्हें गजानन कहा जाने लगा।
विज्ञापन
मुनकटिया गणेश मंदिर के संरक्षण व संवर्द्धन के लिए उसका अधिग्रहण किया जाएगा। आगामी बोर्ड बैठक में इस पर विस्तृत चर्चा की जाएगी। हरसंभव प्रयास होगा कि आगामी यात्रा में बाबा केदार के दर्शनों को आने वाले श्रद्धालु मुनकटिया मंदिर में भी पहुंचें।
-अजेंद्र अजय, अध्यक्ष श्रीबदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति
विज्ञापन
रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राजमार्ग पर सोनप्रयाग से दो किमी आगे मुनकटिया गांव है, जहां पर गणेश भगवान का प्राचीन मंदिर है। मंदिर में पूजा-अर्चना व देखरेख की जिम्मेदारी स्थानीय गोस्वामी परिवार निभा रहे हैं, लेकिन शासन व बीकेटीसी की ओर से मंदिर को पहचान दिलाने के लिए कोई प्रयास नहीं हो पाए हैं। स्थिति यह है कि सोनप्रयाग से दो किमी आगे हाईवे से बमुश्किल सौ मीटर ऊपर इस मंदिर में अभी तक एक भी श्रद्धालु नहीं पहुंचा है। यहां यात्रा के सैलाब में भी सन्नाटा पसरा हुआ है। स्थानीय निवासी दीघार्यु प्रसाद गोस्वामी का कहना है श्रीबदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की ओर से मंदिर के संरक्षण, प्रचार-प्रचार और यात्रा से जोड़ने के लिए पहल नहीं की जा रही है, जबकि गौरीकुंड से केदारनाथ तक आराध्य मां भगवती गौरी, भगवान गणेश और भगवान आशुतोष के मंदिर हैं, लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव में यात्री मुनकटिया पहुंचते ही नहीं हैं। पूर्व में बीकेटीसी को मंदिर के संरक्षण के लिए पत्र भी भेजे गए थे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
विज्ञापन
यह है मुनकटिया की मान्यता
शिव पुराण के अनुसार इसी स्थान पर भगवान शिव ने त्रिशूल से अपने पुत्र गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया था। कारण, माता पार्वती ने गणेश को यह कहकर वहां पर बिठा दिया था कि वह अंदर कक्ष में स्नान कर रही हैं, इसलिए वहां कोई न आए। तभी भगवान शिव वहां पहुंच गए और अंदर जाने लगे। इस पर गणेश ने उन्हें माता की आज्ञा का हवाला देकर रोक दिया। इस पर शिव क्रोधित हो गए और गुस्से में त्रिशूल से अपने पुत्र का सिर काट दिया। बाद में गणेश के शरीर पर नन्हे हाथी का सिर जोड़ा गया, जिससे उन्हें गजानन कहा जाने लगा।
विज्ञापन
मुनकटिया गणेश मंदिर के संरक्षण व संवर्द्धन के लिए उसका अधिग्रहण किया जाएगा। आगामी बोर्ड बैठक में इस पर विस्तृत चर्चा की जाएगी। हरसंभव प्रयास होगा कि आगामी यात्रा में बाबा केदार के दर्शनों को आने वाले श्रद्धालु मुनकटिया मंदिर में भी पहुंचें।
-अजेंद्र अजय, अध्यक्ष श्रीबदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति