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लाशों के मंजर के बीच आंसुओं का समंदर
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रुड़की। बिंडुखड़क गांव में शनिवार को हर तरफ मातम का माहौल नजर आया। जैसे-जैसे अस्पतालों से शव आ रहे थे, गांव की हर गलियां चीत्कार रही थीं। जहरीली शराब पीने से यहां सर्वाधिक 11 लोगों की मौत हुई है। किसी की मांग का सिंदूर उजड़ा है तो किसी के सिर से पिता का साया उठ गया। घरों के आंगन में रोती बिलखती महिलाएं मातम कर रही थीं तो वहीं छतों पर बैठीं औरतें और बच्चों की आंखें रो-रोकर पथरा सी गईं। इस गम के माहौल में हर आंख रोई और सभी के होंठ मौन थे।
अमर उजाला की टीम ने शनिवार सुबह 11 बजे जैसे ही गांव के भीतर प्रवेश किया तो घरों के आंगन में खाटों पर बैठ लोग स्तब्ध आंखों से चुप्पी साधे थे तो वहीं कुछ लोग शराब से उजड़े घरों की कहानी बयां कर रहे थे। थोड़ा अंदर पहुंचने पर गलियों से रोने और चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनाई दीं। किसी से भी पूछो तो यही कहता मिला...‘भगवान करे ऐसा किसी के साथ न हो’। गांव में जगह-जगह बैठे लोग अवैध शराब में लिप्त कारोबारियों और पीने की लत पाल चुके युवाओं की चर्चा करते नजर आए। लोग कह रहे थे कि उन्होंने कई दफा समझाया था कि शराब बुराई है और इससे तौबा कर लो, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।
जिस भी ग्रामीण से बात हुई वही पुलिस को कोसता नजर आया। ग्रामीण ब्रजपाल का कहना था कि इन पुलिसवालों के खिलाफ जमकर छापना। इन्होंने भी मौत बांटने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। उलटे इनकी ही शह पर शराब बांटने वाले लोग उन्हें डराते धमकाते थे। थोड़ा आगे गलियों में कहीं सन्नाटा पसरा था तो कहीं से रोने के आवाजें आ रही थीं। जिन लोगों के घरों में मौत हुई थी, वहां लोगों का जमघट जमा हुआ था। लोग एक-दूसरे को सांत्वना और दिलासा देकर शांत कराने की कोशिश में जुटे थे।
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मौत की खबर सुन करते रहे अपनों के शव का इंतजार
रुड़की। बिंडुखड़क में शुक्रवार से ही सभी की निगाहें विभिन्न अस्पतालों से आने वाली सूचनाओं पर टिकी हैं। जब भी किसी के मरने की खबर आती तो फिर उसके शव का इंतजार शुरू हो जाता। सुबह से शाम तक यही सिलसिला जारी रहा।
मौत का ऐसा मंजर ग्रामीणों की कई पीढ़ियों ने न तो आज तक सुना था और न ही देखा था। ग्रामीणों ने बताया कि शनिवार को अस्पतालों से खबर आई है कि छह लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन दोपहर के एक बजे तक उनके परिजन शव लेकर गांव नहीं पहुंचे हैं। ग्रामीण यह बताते हुए रुआंसे हो रहे थे तो यह भी कह रहे थे कि होनी को कौन टाल सकता है। लोग एक के बाद एक शवों रखते और फिर उनके अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट जाते। गांव में ही बने श्मशान घाट पर चिताओं से लगातार धुुआं उठ रहा था। दो दिन से घरों में न चूल्हे जले और न ही घरों और आंगन की साफ सफाई हुई। मौतों के बाद इस बात की चर्चा थी कि विधवा हो चुकी महिलाओं और बेसहारा हो चुके बच्चों के खाने और गुजारे का काम कैसे होगा। लोगों को उम्मीद है कि सरकार उनकी खोज खबर लेगी, लेकिन शंका भी थी कि सरकार किसी की सुध नहीं लेती। इन सब बातों से हताश ग्रामीणों के हलक सूखे थे और आंखों में पानी था।
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अमर उजाला की टीम ने शनिवार सुबह 11 बजे जैसे ही गांव के भीतर प्रवेश किया तो घरों के आंगन में खाटों पर बैठ लोग स्तब्ध आंखों से चुप्पी साधे थे तो वहीं कुछ लोग शराब से उजड़े घरों की कहानी बयां कर रहे थे। थोड़ा अंदर पहुंचने पर गलियों से रोने और चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनाई दीं। किसी से भी पूछो तो यही कहता मिला...‘भगवान करे ऐसा किसी के साथ न हो’। गांव में जगह-जगह बैठे लोग अवैध शराब में लिप्त कारोबारियों और पीने की लत पाल चुके युवाओं की चर्चा करते नजर आए। लोग कह रहे थे कि उन्होंने कई दफा समझाया था कि शराब बुराई है और इससे तौबा कर लो, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।
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जिस भी ग्रामीण से बात हुई वही पुलिस को कोसता नजर आया। ग्रामीण ब्रजपाल का कहना था कि इन पुलिसवालों के खिलाफ जमकर छापना। इन्होंने भी मौत बांटने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। उलटे इनकी ही शह पर शराब बांटने वाले लोग उन्हें डराते धमकाते थे। थोड़ा आगे गलियों में कहीं सन्नाटा पसरा था तो कहीं से रोने के आवाजें आ रही थीं। जिन लोगों के घरों में मौत हुई थी, वहां लोगों का जमघट जमा हुआ था। लोग एक-दूसरे को सांत्वना और दिलासा देकर शांत कराने की कोशिश में जुटे थे।
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मौत की खबर सुन करते रहे अपनों के शव का इंतजार
रुड़की। बिंडुखड़क में शुक्रवार से ही सभी की निगाहें विभिन्न अस्पतालों से आने वाली सूचनाओं पर टिकी हैं। जब भी किसी के मरने की खबर आती तो फिर उसके शव का इंतजार शुरू हो जाता। सुबह से शाम तक यही सिलसिला जारी रहा।
मौत का ऐसा मंजर ग्रामीणों की कई पीढ़ियों ने न तो आज तक सुना था और न ही देखा था। ग्रामीणों ने बताया कि शनिवार को अस्पतालों से खबर आई है कि छह लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन दोपहर के एक बजे तक उनके परिजन शव लेकर गांव नहीं पहुंचे हैं। ग्रामीण यह बताते हुए रुआंसे हो रहे थे तो यह भी कह रहे थे कि होनी को कौन टाल सकता है। लोग एक के बाद एक शवों रखते और फिर उनके अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट जाते। गांव में ही बने श्मशान घाट पर चिताओं से लगातार धुुआं उठ रहा था। दो दिन से घरों में न चूल्हे जले और न ही घरों और आंगन की साफ सफाई हुई। मौतों के बाद इस बात की चर्चा थी कि विधवा हो चुकी महिलाओं और बेसहारा हो चुके बच्चों के खाने और गुजारे का काम कैसे होगा। लोगों को उम्मीद है कि सरकार उनकी खोज खबर लेगी, लेकिन शंका भी थी कि सरकार किसी की सुध नहीं लेती। इन सब बातों से हताश ग्रामीणों के हलक सूखे थे और आंखों में पानी था।