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श्यामपुर के जंगलों में बन रही कच्ची शराब
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ब्यूरो/अमर उजाला, श्यामपुर। श्यामपुर क्षेत्र के जंगलों में अवैध शराब बनाने का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। आबकारी व पुलिस विभाग की ओर से अब तक कोई कार्रवाई न होने के कारण कच्ची शराब बनाने वालों के हौसले बुलंद हैं। यदि प्रशासन इस तरफ कोई कार्रवाई ध्यान नहीं देता तो रुड़की क्षेत्र की भगवानपुर तहसील में जहरीली शराब से हुए नुकसान की तरह यहां भी लोगों की जान जा सकती है। शराब की भट्टियों को हटाने के लिए स्थानीय महिलाओं ने कई बार शराब के अवैध कारोबार के खिलाफ संघर्ष किया लेकिन प्रशासन की ढिलाई के चलते महिलाओं की मुहिम सफल नहीं हो पाई।
श्यामपुर अंतर्गत गुलरानी, मंसादेवी, रूसाफार्म, भट्टोंवाला, प्लांटेशन, छिद्रवाला में नबाववाला जंगल से सटा क्षेत्र कच्ची शराब बनाने को लेकर चर्चित है। जंगल से सटे इन क्षेत्रों में तो शराब बनती ही है साथ ही वन क्षेत्र के अंदर भी ये कारोबार अपनी जड़ें जमा चुका है। इस कारोबार ने क्षेत्र में लघु कुटीर उद्योग की शक्ल अख्तियार कर ली है। इन क्षेत्रों के आसपास की कई दुकानों में कच्ची शराब में प्रयुक्त होने वाला गुड़ जमकर बिकता है। गुड़ से ही शराब बनाने का लाहन तैयार किया जाता है।
दिखावे की कार्रवाई और लुका छिपी का खेल जारी
श्यामपुर। शराब के अवैध कारोबार और प्रशासन के बीच लुका छिपी का खेल कई सालों से चल रहा है। दिखावे के लिए कई बार कार्रवाई करने की बात की जाती है, लेकिन शराब माफिया जंगल के भीतर अपना ठौर बना लेते हैं। फिलहाल अवैध कारोबारियों ने दिखावे की कार्रवाई से भी पीछा छुड़ाने के लिए जंगल में स्थायी भट्ठियां बना ली हैं। जंगल के अंदर शराब माफियाओं ने गड्ढे़ खोदकर उसमें पन्नी बिछा कर लाहन जमा कर रखा है। जब ये लाहन सड़ता है तब जंगलों में भट्टियां लगा शराब उतारी जाती है। कच्ची शराब बनाने के लिए साल व अन्य वृक्षों की छाल का भी प्रयोग करते हैं। जिन वृक्षों की छाल निकाली जाती है वह बाद में सूख जाते हैं। इस कारण पर्यावरण का पेड़ों में टांगे जाते हैं लाहन की पीपे
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छिद्रवाला के नवाबवाला में एक साल पहले उस समय जंगल के अंदर अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिली थी जब बड़े-बड़े वृक्षों में लाहन के पीपे टंगे हुए मिले थे। बाद में पता चला कि हाथी भी लाहन (गुड़ का पानी) पीने का शौकीन हो गया है। हाथियों को लाहन इतना भाया कि गड्ढे खोदकर प्यास बुझाने लगे। इससे बचने के लिए माफियाओं ने चेनकुप्पी की सहायता से एक-एक पेड़ में कई पीपे टांगने लगे। स्थानीय महिलाओं का कहना था कि छोटे-छोटे बच्चे भी शराब पीने के लत हो गए हैं। आज भी मंसादेवी, गुलरानी क्षेत्र में पियक्कड़ों का तांता लगा रहता है।
कोट्स
जंगलों में पहले कच्ची शराब बनती होगी, लेकिन अब नहीं बनाई जा रही है। कुछ इक्का दुक्का लोग जंगलों से सटे गांव में बनाते हैं। जंगलों में खाली जगह पर प्लांटेशन भी किया गया है।
-आरपीएस नेगी, वन क्षेत्राधिकारी, ऋषिकेश।
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श्यामपुर अंतर्गत गुलरानी, मंसादेवी, रूसाफार्म, भट्टोंवाला, प्लांटेशन, छिद्रवाला में नबाववाला जंगल से सटा क्षेत्र कच्ची शराब बनाने को लेकर चर्चित है। जंगल से सटे इन क्षेत्रों में तो शराब बनती ही है साथ ही वन क्षेत्र के अंदर भी ये कारोबार अपनी जड़ें जमा चुका है। इस कारोबार ने क्षेत्र में लघु कुटीर उद्योग की शक्ल अख्तियार कर ली है। इन क्षेत्रों के आसपास की कई दुकानों में कच्ची शराब में प्रयुक्त होने वाला गुड़ जमकर बिकता है। गुड़ से ही शराब बनाने का लाहन तैयार किया जाता है।
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दिखावे की कार्रवाई और लुका छिपी का खेल जारी
श्यामपुर। शराब के अवैध कारोबार और प्रशासन के बीच लुका छिपी का खेल कई सालों से चल रहा है। दिखावे के लिए कई बार कार्रवाई करने की बात की जाती है, लेकिन शराब माफिया जंगल के भीतर अपना ठौर बना लेते हैं। फिलहाल अवैध कारोबारियों ने दिखावे की कार्रवाई से भी पीछा छुड़ाने के लिए जंगल में स्थायी भट्ठियां बना ली हैं। जंगल के अंदर शराब माफियाओं ने गड्ढे़ खोदकर उसमें पन्नी बिछा कर लाहन जमा कर रखा है। जब ये लाहन सड़ता है तब जंगलों में भट्टियां लगा शराब उतारी जाती है। कच्ची शराब बनाने के लिए साल व अन्य वृक्षों की छाल का भी प्रयोग करते हैं। जिन वृक्षों की छाल निकाली जाती है वह बाद में सूख जाते हैं। इस कारण पर्यावरण का पेड़ों में टांगे जाते हैं लाहन की पीपे
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छिद्रवाला के नवाबवाला में एक साल पहले उस समय जंगल के अंदर अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिली थी जब बड़े-बड़े वृक्षों में लाहन के पीपे टंगे हुए मिले थे। बाद में पता चला कि हाथी भी लाहन (गुड़ का पानी) पीने का शौकीन हो गया है। हाथियों को लाहन इतना भाया कि गड्ढे खोदकर प्यास बुझाने लगे। इससे बचने के लिए माफियाओं ने चेनकुप्पी की सहायता से एक-एक पेड़ में कई पीपे टांगने लगे। स्थानीय महिलाओं का कहना था कि छोटे-छोटे बच्चे भी शराब पीने के लत हो गए हैं। आज भी मंसादेवी, गुलरानी क्षेत्र में पियक्कड़ों का तांता लगा रहता है।
कोट्स
जंगलों में पहले कच्ची शराब बनती होगी, लेकिन अब नहीं बनाई जा रही है। कुछ इक्का दुक्का लोग जंगलों से सटे गांव में बनाते हैं। जंगलों में खाली जगह पर प्लांटेशन भी किया गया है।
-आरपीएस नेगी, वन क्षेत्राधिकारी, ऋषिकेश।