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पिथौरागढ़ : पांच लाख की आबादी पर सिर्फ एक ब्लड बैंक
Thu, 02 Nov 2023 11:07 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Thu, 02 Nov 2023 11:07 PM IST
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पिथौरागढ़। पांच लाख की आबादी वाले पिथौरागढ़ जिले में एकमात्र बीडी पांडेय जिला अस्पताल में ब्लड बैंक है। जिला अस्पताल को छोड़कर किसी भी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या संयुक्त अस्पताल में खून चढ़ाने की सुविधा नहीं है। आपात स्थिति में बीमार, गर्भवती या घायल को जिला अस्पताल पहुंचाना पड़ता है।
जिले के दूरस्थ क्षेत्रों से अस्पताल पहुंचने के लिए 50 से 100 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय में जिला अस्पताल, महिला अस्पताल के अलावा डीडीहाट, गंगोलीहाट, बेड़ीनाग, धारचूला, मुनस्यारी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं।
पिथौरागढ़ के जिला रक्तकोष प्रभारी डॉ.नरेंद्र शर्मा ने बताया कि ब्लड बैंक से हर माह लगभग 250 यूनिट रक्त विभिन्न अस्पतालों को उपलब्ध कराया जाता है। उन्होंने बताया कि जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, सेना अस्पताल के अलावा प्राइवेट अस्पतालों को जरूरत के अनुसार रक्त दिया जाता है। मांग पर चंपावत जिला अस्पताल को भी रक्त दिया जाता है। वर्तमान में पिथौरागढ़ ब्लड बैंक में खून से प्लाज्मा तैयार किया जा रहा है।
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चंपावत के मैदानी इलाकों के लोग यूएस नगर पर आश्रित
जिले के पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों की जरूरत को पूरा करता है जिला अस्पताल का रक्त कोष
संवाद न्यूज एजेंसी
चंपावत। चंपावत जिले के पर्वतीय क्षेत्र में अमूमन रक्त की पर्याप्तता है। इसके लिए चंपावत जिला अस्पताल में रक्त कोष है लेकिन मैदानी क्षेत्र टनकपुर और बनबसा में खून की उपलब्धता नहीं है। इस कारण टनकपुर उप जिला अस्पताल में सर्जन और निश्चेतक होने के बावजूद ऑपरेशन नहीं हो पाते हैं।
ऑपरेशन के लिए मैदान के लोगों को ऊधमसिंह नगर, हल्द्वानी, बरेली की दौड़ लगानी पड़ती है। जिले का एकमात्र रक्त कोष जिला अस्पताल में है। रक्त कोष प्रभारी डॉ. राशी भटनागर का कहना है कि चंपावत में रक्त की कमी नहीं है। हर माह औसतन 35 यूनिट खून की जरूरत होती है।
निगेटिव ग्रुप वालों को ऑन कॉल बुलाया जाता है। जिला अस्पताल के रक्त कोष से लोहाघाट और पहाड़ के अधिकांश जगहों की जरूरत पूरी हो जाती है। लेकिन 75 किमी दूर टनकपुर के लोग यहां नहीं आ पाते हैं।
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दो करोड़ रुपये से बने दोनों ट्रॉमा सेंटर किसी काम के नहीं
टनकपुर के सेंटर में बना है डीडीआरसी और लोहाघाट में हो रहा ओपीडी मरीजों का इलाज
संवाद न्यूज एजेंसी
चंपावत। जिले में एक नहीं दो-दो ट्रॉमा सेंटर हैं, लेकिन काम का एक भी नहीं। 2.02 करोड़ रुपये से बने टनकपुर और लोहाघाट ट्रॉमा सेंटर में न उपकरण हैं और ना ही विशेषज्ञ डॉक्टर। दुर्घटनाएं या अन्य किसी तरह की आकस्मिक जरूरत होने पर इन केंद्रों से कोई इलाज नहीं मिलता। इस कारण वक्त पर मदद नहीं मिलने से देरी के चलते कई बार गंभीर चोटिल लोगों को जान तक गंवानी पड़ती है।
लोहाघाट के ट्रॉमा सेंटर में वाह्य रोगियों का इलाज कक्ष बनाया गया है। वहीं टनकपुर के सेंटर को इस साल अप्रैल से डीडीआरसी (जिला दिव्यांग राहत केंद्र) में तब्दील कर दिया गया है। इस केंद्र में विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र कार्ड बनाने सहित दिव्यांगों से संबंधित काम हो रहा है।
किसी भी तरह की आकस्मिकता में लोग टनकपुर से 125 किमी दूर हल्द्वानी जाने को मजबूर हो रहे हैं। इस कारण देरी की वजह से जिंदगी पर भी खतरा होते रहा। पिछले तीन साल में हायर सेंटर रेफर किए गए मामलों मे इलाज में देरी से 47 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
कोट
टनकपुर ट्रॉमा सेंटर को डीडीआरसी को अस्थाई रूप से दिया गया है। जब भी जरूरत होगी, इसे वापस ले लिया जाएगा। पिछले महीने ऋषिकेश एम्स से एक टीम स्थलीय निरीक्षण कर टनकपुर के ट्रॉमा सेंटर के संचालन की संभावनाओं पर काम कर रही है। - डॉ. केके अग्रवाल, सीएमओ, चंपावत।
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जिले के दूरस्थ क्षेत्रों से अस्पताल पहुंचने के लिए 50 से 100 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय में जिला अस्पताल, महिला अस्पताल के अलावा डीडीहाट, गंगोलीहाट, बेड़ीनाग, धारचूला, मुनस्यारी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं।
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पिथौरागढ़ के जिला रक्तकोष प्रभारी डॉ.नरेंद्र शर्मा ने बताया कि ब्लड बैंक से हर माह लगभग 250 यूनिट रक्त विभिन्न अस्पतालों को उपलब्ध कराया जाता है। उन्होंने बताया कि जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, सेना अस्पताल के अलावा प्राइवेट अस्पतालों को जरूरत के अनुसार रक्त दिया जाता है। मांग पर चंपावत जिला अस्पताल को भी रक्त दिया जाता है। वर्तमान में पिथौरागढ़ ब्लड बैंक में खून से प्लाज्मा तैयार किया जा रहा है।
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चंपावत के मैदानी इलाकों के लोग यूएस नगर पर आश्रित
जिले के पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों की जरूरत को पूरा करता है जिला अस्पताल का रक्त कोष
संवाद न्यूज एजेंसी
चंपावत। चंपावत जिले के पर्वतीय क्षेत्र में अमूमन रक्त की पर्याप्तता है। इसके लिए चंपावत जिला अस्पताल में रक्त कोष है लेकिन मैदानी क्षेत्र टनकपुर और बनबसा में खून की उपलब्धता नहीं है। इस कारण टनकपुर उप जिला अस्पताल में सर्जन और निश्चेतक होने के बावजूद ऑपरेशन नहीं हो पाते हैं।
ऑपरेशन के लिए मैदान के लोगों को ऊधमसिंह नगर, हल्द्वानी, बरेली की दौड़ लगानी पड़ती है। जिले का एकमात्र रक्त कोष जिला अस्पताल में है। रक्त कोष प्रभारी डॉ. राशी भटनागर का कहना है कि चंपावत में रक्त की कमी नहीं है। हर माह औसतन 35 यूनिट खून की जरूरत होती है।
निगेटिव ग्रुप वालों को ऑन कॉल बुलाया जाता है। जिला अस्पताल के रक्त कोष से लोहाघाट और पहाड़ के अधिकांश जगहों की जरूरत पूरी हो जाती है। लेकिन 75 किमी दूर टनकपुर के लोग यहां नहीं आ पाते हैं।
दो करोड़ रुपये से बने दोनों ट्रॉमा सेंटर किसी काम के नहीं
टनकपुर के सेंटर में बना है डीडीआरसी और लोहाघाट में हो रहा ओपीडी मरीजों का इलाज
संवाद न्यूज एजेंसी
चंपावत। जिले में एक नहीं दो-दो ट्रॉमा सेंटर हैं, लेकिन काम का एक भी नहीं। 2.02 करोड़ रुपये से बने टनकपुर और लोहाघाट ट्रॉमा सेंटर में न उपकरण हैं और ना ही विशेषज्ञ डॉक्टर। दुर्घटनाएं या अन्य किसी तरह की आकस्मिक जरूरत होने पर इन केंद्रों से कोई इलाज नहीं मिलता। इस कारण वक्त पर मदद नहीं मिलने से देरी के चलते कई बार गंभीर चोटिल लोगों को जान तक गंवानी पड़ती है।
लोहाघाट के ट्रॉमा सेंटर में वाह्य रोगियों का इलाज कक्ष बनाया गया है। वहीं टनकपुर के सेंटर को इस साल अप्रैल से डीडीआरसी (जिला दिव्यांग राहत केंद्र) में तब्दील कर दिया गया है। इस केंद्र में विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र कार्ड बनाने सहित दिव्यांगों से संबंधित काम हो रहा है।
किसी भी तरह की आकस्मिकता में लोग टनकपुर से 125 किमी दूर हल्द्वानी जाने को मजबूर हो रहे हैं। इस कारण देरी की वजह से जिंदगी पर भी खतरा होते रहा। पिछले तीन साल में हायर सेंटर रेफर किए गए मामलों मे इलाज में देरी से 47 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
कोट
टनकपुर ट्रॉमा सेंटर को डीडीआरसी को अस्थाई रूप से दिया गया है। जब भी जरूरत होगी, इसे वापस ले लिया जाएगा। पिछले महीने ऋषिकेश एम्स से एक टीम स्थलीय निरीक्षण कर टनकपुर के ट्रॉमा सेंटर के संचालन की संभावनाओं पर काम कर रही है। - डॉ. केके अग्रवाल, सीएमओ, चंपावत।