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दक्षिण अफ्रीका तक पहुंचा मुवानी का रिंगाल उत्पाद
दीपक उप्रेती/अमर उजाला, पिथौरागढ़
Updated Sat, 01 Apr 2017 10:38 PM IST
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पिथौरागढ़ में रिंगाल से बनी वस्तुओं को देखते लोग
- फोटो : अमर उजाला
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एमकॉम तक की शिक्षा प्राप्त 48 वर्षीय राजेंद्र पंत ने 2009 से मुवानी में रिंगाल की सामग्री बनाने का जो काम शुरू किया था, उसकी गूंज दक्षिण अफ्रीका तक पहुंच गई। विलेज लेबल ट्रस्ट के माध्यम से रिंगाल से बनी यह सामग्री दक्षिण अफ्रीका पहुंचाई गई। 60 हजार कीमत का यह सामान छह माह पहले ले जाया गया था।
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टाटा ट्रस्ट और नाबार्ड के सहयोग से 2009 में जब राजेंद्र पंत ने अपनी संस्था सुगंध उत्तरापथ के माध्यम से रिंगाल का काम शुरू किया तो उस समय उनको लगा कि इसे मुकाम तक पहुंचाने में दिक्कतें जरूर आएंगी। उन्होंने सबसे पहले खाली पड़ी जमीन पर लोगों को रिंगाल और बांस पैदा करने के लिए प्रेरित किया। इन वर्षों में वह रिंगाल के 11 हजार और बांस के 65 हजार पौधे तैयार कर चुके हैं।
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यही नहीं ‘पहाड़क् महक’ नाम से वह लोगों के खेतों में तैयार होने वाली हल्दी, मिर्च, धनिया की पैकिंग भी करने लगे हैं। पंत ने बताया कि पिछले सीजन में उन्होंने महिला समूहों के माध्यम से 70 टन हल्दी का उत्पादन किया। राजेंद्र पंत बताते हैं कि यदि पहाड़ के युवा प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित काम शुरू करने लगें तो उनको रोजगार के लिए अपना इलाका नहीं छोड़ना पड़ेगा। आज उनके साथ प्रत्यक्ष रूप से 2300 और परोक्ष रूप से 6500 किसान जुड़ चुके हैं। पहाड़ के खेतों को जंगली जानवरों द्वारा नुकसान पहुंचाने के कारण लोगों ने खेतीबाड़ी को कम कर दिया था, लेकिन उनको इसकी जगह नया विकल्प देने की सोच राजेंद्र पंत ने ही दी।
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इस समय उनके पास छह ट्रेडिशनल आर्टीजन हैं, जो अब तक 60 लोगों को रिंगाल तथा बांस से सामग्री तैयार करने का प्रशिक्षण दे चुके हैं। वह कहते हैं कि अब काश्तकार की जेब में पैसा आने लगा है। वह मानते हैं कि पहाड़ पर ट्री-क्राप फार्मिंग को बढ़ावा देने की जरूरत है। इससे लोगों को पेड़ों का महत्व समझ में आएगा। वह दावा करते हैं कि रिंगाल उत्पाद और पहाड़क् महक से मुवानी घाटी को नई पहचान मिली है। उनके द्वारा तैयार रिंगाल के उत्पादों को लोग हाथों हाथ ले रहे हैं और अपने घरों की सजावट में उसका उपयोग कर रहे हैं।