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PM Modi Uttarakhand Visit: उच्च हिमालयी क्षेत्र के इस आश्रम में रुकेंगे पीएम, जानें इसके बारे में खास बातें
Sun, 10 Sep 2023 05:13 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sun, 10 Sep 2023 05:13 PM IST
सार
नारायण आश्रम की स्थापना वर्ष 1936 में कर्नाटक के संत नारायण स्वामी ने की। उन्होंने इस भूमि को हिमालय के इस ओर का कैलाश की संज्ञा दी।
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धारचूला के चौदास घाटी में स्थित नारायण आश्रम। संवाद
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अक्तूबर दूसरे सप्ताह में उच्च हिमालयी क्षेत्र का भ्रमण कार्यक्रम संभावित है। वह दो दिनी प्रवास में एक दिन धारचूला के चौदास घाटी स्थित नारायण आश्रम में रात्रि विश्राम करेंगे। इस नारायण आश्रम की स्थापना वर्ष 1936 में कर्नाटक के संत नारायण स्वामी ने की। उन्होंने इस भूमि को हिमालय के इस ओर का कैलाश की संज्ञा दी।
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पहाड़ पत्रिका के अंक में नारायण स्वामी सृजन एवं साधना अंक के लेखक डॉ. ललित पंत ने वर्ष 1954 में पहली बार स्वामी के दर्शन किए। इसके बाद कई बार वह अपने माता-पिता के साथ उनके सानिध्य में रहे। 1935 में कैलाश मानसरोवर की यात्रा के बाद वापसी में स्वामी ने तपोवन में डेरा डाला। एकांत साधना के क्षण में उन्हें लगा कि हिमालयी अंचल ही उनका कार्य क्षेत्र होना चाहिए। उनके मन में आश्रम की रूपरेखा बन गई। इस विचार को मूर्त रूप देने में पं. ईश्वरी दत्त पांडे जैसे शिष्य उन्हें मिले। चौदास घाटी के सोसा के ग्रामीणों ने नारायण स्वामी के तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर आश्रम के भूदान करना स्वीकार किया।
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26 मार्च 1936 को आश्रम स्थापना का कार्य संपन्न हुआ। इसमें एक कुटिया बनाई गई जिसमें स्वामी ध्यान लगाते थे। 1939 में पक्के भवन का निर्माण शुरू हुआ। गंगानगर, बड़ौदा, अहमदाबाद, पूजा, मुंबई के नारायण भक्तों ने धन का दान दिया। अगस्त 1946 में यहां भगवान नारायण की मूर्ति स्थापित की प्राण प्रतिष्ठा की गई।डॉ. पंत लिखते हैं कि नारायण कर्म के बिना साधना को अर्थहीन मानते थे। स्वामी ने अस्कोट से पश्चिम की ओर चढ़ती पहाड़ी के शीर्ष पर शिक्षा की अलख जगाने के लिए 1948 में स्कूल की नींव रखी। नौ नवंबर 1956 को 44 वर्ष की आयु में स्वामी कलकत्ता में ब्रह्मलीन हो गए।
नारायण ऊं शब्द से भाव समाधि
डॉ. ललित पंत अपने लेख सृजन साधना में लिखते हैं कि पिथौरागढ़ पड़ाव के दौरान पांच-छह वर्ष की उम्र में वह अपने पिताजी के साथ नारायण के संकीर्तन में गए। जब कीर्तन चरम पर पहुंचा तो नारायण ऊं की धुन में दोनों हाथों से करताल बजाते झूमते हुए वह अपने आसन से उठते जान पड़ते थे। नारायण-नारायण के उच्चारण के साथ ही वह भाव समाधि में चले गए।