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गोवर्धन प्रतिपदा को हुई गायों की पूजा
Updated Fri, 20 Oct 2017 10:23 PM IST
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पिथौरागढ़/डीडीहाट। गोवर्धन प्रतिपदा पर गायों की पूजा की गई। उन पर फूल, अक्षत चढ़ाए गए। गले में फूलों की माला पहनाई गई। हर गाय के सिर पर चावल के आटे से तैयार बिस्वार का निशान लगाया गया, ताकि गाय रोगमुक्त रहे और अच्छा दूध देती रहे।
डीडीहाट में गायों का पूजन परंपरागत तरीके से किया गया। महिलाओं ने गाय के पांव धोए, फिर पूजन किया। शहरों में भी जिन लोगों के पास एक-दो गायें उपलब्ध हैं, उनका पूजन हुआ। गोवर्धन प्रतिपदा के दिन बैलों के पूजन की भी परंपरा रही है, लेकिन अब यह परंपरा लुप्त होने लगी है। एक तो ग्रामीण अंचलों में बैलों की संख्या कम होती जा रही है। लोग खेतीबाड़ी कम करते हैं। पहले बैलों का भी आज के दिन पूजन किया जाता था। उनके सिर पर रामबांस के रेशे से तैयार एक रंगीन फुन बांधा जाता था। बैल पर्वतीय कृषि का सबसे प्रमुख हिस्सा है। अब बैलों की संख्या कम हो रही है और यह परंपरा भी लुप्त होने लगी है।
बता दें कि दिवाली के अगले दिन आने वाले गोवर्धन प्रतिपदा का अलग महत्व है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने गायों की रक्षा के लिए इसी दिन गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था। पहाड़ पर गोवर्धन प्रतिपदा के दिन गायों के पूजन की परंपरा अभी जिंदा है। पहले पहाड़ के लोग बड़ी संख्या में जानवर पालते थे। धीरे-धीरे चारे की समस्या सामने आने के कारण जानवरों की संख्या कम कर दी गई है। अब उन्नत नस्ल की एक दो गायों को पालने का प्रचलन बढ़ा है। शहरों में लोग एक-दो गायों को पालकर दूध बेचने का काम करते हैं।
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डीडीहाट में गायों का पूजन परंपरागत तरीके से किया गया। महिलाओं ने गाय के पांव धोए, फिर पूजन किया। शहरों में भी जिन लोगों के पास एक-दो गायें उपलब्ध हैं, उनका पूजन हुआ। गोवर्धन प्रतिपदा के दिन बैलों के पूजन की भी परंपरा रही है, लेकिन अब यह परंपरा लुप्त होने लगी है। एक तो ग्रामीण अंचलों में बैलों की संख्या कम होती जा रही है। लोग खेतीबाड़ी कम करते हैं। पहले बैलों का भी आज के दिन पूजन किया जाता था। उनके सिर पर रामबांस के रेशे से तैयार एक रंगीन फुन बांधा जाता था। बैल पर्वतीय कृषि का सबसे प्रमुख हिस्सा है। अब बैलों की संख्या कम हो रही है और यह परंपरा भी लुप्त होने लगी है।
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बता दें कि दिवाली के अगले दिन आने वाले गोवर्धन प्रतिपदा का अलग महत्व है। कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने गायों की रक्षा के लिए इसी दिन गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था। पहाड़ पर गोवर्धन प्रतिपदा के दिन गायों के पूजन की परंपरा अभी जिंदा है। पहले पहाड़ के लोग बड़ी संख्या में जानवर पालते थे। धीरे-धीरे चारे की समस्या सामने आने के कारण जानवरों की संख्या कम कर दी गई है। अब उन्नत नस्ल की एक दो गायों को पालने का प्रचलन बढ़ा है। शहरों में लोग एक-दो गायों को पालकर दूध बेचने का काम करते हैं।
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