{"_id":"5b070d724f1c1bb16e8b4673","slug":"21527188850-champawat-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"गंगा दशहरा पर्व उल्लास से मनाया","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गंगा दशहरा पर्व उल्लास से मनाया
Updated Fri, 25 May 2018 12:37 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
चंपावत। यहां गंगा दशहरा पर्व उल्लास के साथ मनाया गया। ब्राह्मणों ने यजमानों को गंगा दशहरा द्वार पत्र दिए। जिसे यजमानों ने घर की देहरी पर चिपकाया। ये पर्व मन के विकार नष्ट करने और कालसर्प योग से मुक्ति के लिए किया जाता है। पंडित दिनेश चंद्र त्रिपाठी ने बताया कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा पत्र मनाया जाता है। इस दिन गंगा का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था।
उन्होंने बताया कि पुरातन समय में महाराज सगर ने एक बार विशाल यज्ञ का आयोजन किया। देवराज इंद्र ने राजा सगर के घोड़े का अपहरण कर उसे कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। सगर के पुत्र जब मुनि कपिल के आश्रम पहुंचे तो उनकी तपस्या में विघभन पड़ गया। इससे क्रोधित होकर उन्होंने राजा के हजारों पुत्रों को भस्म कर दिया। तब सगर के पौत्र भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। साथ ही उन्होंने गंगा के वेग को रोकने के लिए शंकर भगवान को मनाने को कहा। शिवजी के प्रसन्न होने के बाद गंगा का अवतरण पृथ्वी पर हुआ। तभी से गंगा दशहरा पर्व मनाए जाने की परंपरा है।
उन्होंने बताया कि पुरातन समय में महाराज सगर ने एक बार विशाल यज्ञ का आयोजन किया। देवराज इंद्र ने राजा सगर के घोड़े का अपहरण कर उसे कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। सगर के पुत्र जब मुनि कपिल के आश्रम पहुंचे तो उनकी तपस्या में विघभन पड़ गया। इससे क्रोधित होकर उन्होंने राजा के हजारों पुत्रों को भस्म कर दिया। तब सगर के पौत्र भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। साथ ही उन्होंने गंगा के वेग को रोकने के लिए शंकर भगवान को मनाने को कहा। शिवजी के प्रसन्न होने के बाद गंगा का अवतरण पृथ्वी पर हुआ। तभी से गंगा दशहरा पर्व मनाए जाने की परंपरा है।
विज्ञापन