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निदा का जाना कभी पूरा न होने वाला नुकसान: अब्बासी
ब्यूरो/अमर उजाला अमरोहा
Updated Tue, 09 Feb 2016 12:55 AM IST
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हिंदुस्तानी सरजमीं पर उर्दू के सबसे मुमताज शायरों में शामिल निदा फाजली के देहांत की खबर जैसे ही अमरोहा पहुंची उनके चाहने वालो में दुख की लहर दौड़ गई। रजिया सुल्तान फिल्म बनने के दौरान ये कमाल अमरोहवी के साथ यहां आए थे, उनकी यादें अभी भी परिचितों के जेहन में हैं।
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाय; शेर के लिए मशहूर और कमाल अमरोहवी की फिल्म रजिया सुल्तान के गाने आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करे व जगजीत सिंह के जरिये पढ़ी गई ग़जल होश वालों को खबर...से पूरी दुनिया में मशहूर मुक़तदा हसन उर्फनिदा फ़ाजली का जन्म दिल्ली में हुआ था, जो बाद में जीवन यापन के लिए मुंबई चले गए थे।
निदा फ़ाजली के आकस्मिक निधन पर उत्तर प्रदेश उर्दू अदब सोसाइटी की जानिब से एक जलसे का आयोजन शहर के पीरजादा स्थित कार्यालय पर किया गया। जहां निदा फाजली के निधन पर समस्त सदस्यों ने दुख प्रकट किया। सोसाइटी के अध्यक्ष कौसर अली अब्बासी ने कहा निदा साहब का निधन एक न पूरा होने वाला नुकसान है।
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अब्बासी ने बताया की वे 1991 और उसके बाद भी हमारे मुशायरे में हिस्सा ले चुके हैं लेकिन फोन पर मुसलसल रब्ते में रहते थे। वो इंसानियत के पैरोकार थे उनके कलाम में समाज की हकीक़त और उस वर्ग का दर्द होता था जो बड़ी मुश्किल से जिन्दगी बसर कर रहा है। इस अवसर पर इकबाल अहमद खा, डॉ चन्दन नकवी, रोमी शफात, अली अबिदी , कमाल अमरोहवी , खालिद सिद्दीकी, खुश्तर मिर्जा, खालिद निजामी, सलीम खां, हमजा अब्बासी, केसर अली मौजूद थे। सांस्कृतिक संस्था हुसन आरा ट्रस्ट ने भी अफ़सोस जाहिर किया।
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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाय; शेर के लिए मशहूर और कमाल अमरोहवी की फिल्म रजिया सुल्तान के गाने आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करे व जगजीत सिंह के जरिये पढ़ी गई ग़जल होश वालों को खबर...से पूरी दुनिया में मशहूर मुक़तदा हसन उर्फनिदा फ़ाजली का जन्म दिल्ली में हुआ था, जो बाद में जीवन यापन के लिए मुंबई चले गए थे।
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निदा फ़ाजली के आकस्मिक निधन पर उत्तर प्रदेश उर्दू अदब सोसाइटी की जानिब से एक जलसे का आयोजन शहर के पीरजादा स्थित कार्यालय पर किया गया। जहां निदा फाजली के निधन पर समस्त सदस्यों ने दुख प्रकट किया। सोसाइटी के अध्यक्ष कौसर अली अब्बासी ने कहा निदा साहब का निधन एक न पूरा होने वाला नुकसान है।
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अब्बासी ने बताया की वे 1991 और उसके बाद भी हमारे मुशायरे में हिस्सा ले चुके हैं लेकिन फोन पर मुसलसल रब्ते में रहते थे। वो इंसानियत के पैरोकार थे उनके कलाम में समाज की हकीक़त और उस वर्ग का दर्द होता था जो बड़ी मुश्किल से जिन्दगी बसर कर रहा है। इस अवसर पर इकबाल अहमद खा, डॉ चन्दन नकवी, रोमी शफात, अली अबिदी , कमाल अमरोहवी , खालिद सिद्दीकी, खुश्तर मिर्जा, खालिद निजामी, सलीम खां, हमजा अब्बासी, केसर अली मौजूद थे। सांस्कृतिक संस्था हुसन आरा ट्रस्ट ने भी अफ़सोस जाहिर किया।