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Almora News: अस्तित्व खो रहीं हैं दवा फैक्टरी, मारा-मारा फिर रहा है मजदूर
Wed, 01 May 2024 12:12 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
Updated Wed, 01 May 2024 12:12 AM IST
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अल्मोड़ा।
भले ही पहाड़ों में उद्योग स्थापित कर बेरोजगारों को रोजगार देने के दावे हो रहे हैं लेकिन पूर्व में स्थापित उद्योग बंद कर लोगों का रोजगार छीना जा रहा है। अल्मोड़ा जिले में अपना अस्तित्व खो रहीं दो हजार से अधिक लोगों को रोजगार देने वालीं दो दवा फैक्टरी इसका प्रमाण हैं। रानीखेत में स्थापित 1000 लोगों को रोजगार देने वाली फैक्टरी निजी हाथों में सौंप दी गई और 950 से अधिक लोग बेरोजगार होकर मारे-मारे फिर रहे हैं। वहीं सल्ट के मोहान में संचालित दवा फैक्टरी के निजी हाथों में सौंपने की तैयारी होते ही 300 लोगों की रोजी-रोटी पर संकट मंडरा गया है।
रानीखेत में स्थापित दवा फैक्टरी की राज्य गठन से पूर्व देश-दुनिया में अलग पहचान थी। 80 के दशक तक फैक्टरी में करीब 1000 कामगार नौकरी कर रोजगार से जुड़े थे। राज्य गठन के बाद हिमालयी जड़ी बूटियों का संरक्षण और आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण करने वाली यह सरकारी दवा फैक्टरी अपना अस्तित्व नहीं बचा सकी और 2023 में इसे निजी हाथों में सौंप दिया गया। अब यहां मात्र 15 कर्मचारियों की तैनाती है और 985 लोगों से रोजगार छिन गया। वहीं मोहान में स्थापित 300 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाली दवा फैक्टरी आईएमपीएल को भी निजी हाथों में सौंपने की तैयारी अंतिम चरण में है, इसका लंबे समय से विरोध हो रहा है। यदि इस फैक्टरी का निजीकरण हुआ तो की लोगों का रोजगार छिनना तय है। जिले में स्थापित उद्योग दम तोड़ रहे हैं और रोजगार के लिए लोग मारे-मारे फिर रहे हैं,लेकिन नए उद्योग स्थापित कर रोजगार के द्वार खोलने के दावे जरूर हो रहे हैं। संवाद
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आयुर्वेदिक दवा के लिए प्रसिद्ध थी रानीखेत की गनियाद्योली फैक्टरी
अल्मोड़ा। 1954 में गनियाद्योली में ड्रग फैक्टरी की स्थापना की गयी। फैक्टरी के पास ही भेषज विकास संघ की भूमि पर जड़ी बूटियों का उत्पादन कर इससे च्यवनप्राश, आसव, अशोकारिस्ट, त्रिफला, गुगुल, गंधक रसायन, अभ्रक भष्म, लवण भास्कर चूर्ण, आसव बटिया सहित उदर रोगों से संबंधित 200 से अधिक प्रकार की दवाइयां बनाईं जाती थीं। राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि उत्तराखंड राज्य के कई श्रमिकों को फैक्ट्री में नौकरी दी जाएगी, लेकिन धीरे-धीरे सरकारी मशीनरी की उपेक्षा के कारण फैक्टरी अपने अस्तित्व को नहीं बचा सकी और इसका निजीकरण हो गया। जड़ी बूटियों का उत्पादन भी ठप हो गया। अब फैक्टरी को जड़ी बूटियों के लिए दिल्ली, हरिद्वार, हाथरस सहित अन्य प्रदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
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कभी लोगों की जिंदगी बचाने वाली दवा फैक्टरी पड़ी है वीरान
अल्मोड़ा। कभी लोगों की जिंदगी बचाने के साथ ही 400 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाली दवा फैक्टरी वीरान पड़ी है। अल्मोड़ा के पातालदेवी में आल्पस फार्मास्यूटिकल्स दवा कंपनी 1975 में स्थापित की गई। यहां बनने वाली दवाइयां उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के अलावा कई राज्यों में सप्लाई होती थीं। वहीं यह कंपनी सैकड़ों स्थानीय लोगों के परिवारों का पेट भर रही थी। अब फैक्ट्री बंद हो चुकी है और इससे जुड़े काफी लोग आज भी बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। इस कंपनी में 2017 में ताले लटक गए, जो अब तक नहीं खुल सके हैं।
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भले ही पहाड़ों में उद्योग स्थापित कर बेरोजगारों को रोजगार देने के दावे हो रहे हैं लेकिन पूर्व में स्थापित उद्योग बंद कर लोगों का रोजगार छीना जा रहा है। अल्मोड़ा जिले में अपना अस्तित्व खो रहीं दो हजार से अधिक लोगों को रोजगार देने वालीं दो दवा फैक्टरी इसका प्रमाण हैं। रानीखेत में स्थापित 1000 लोगों को रोजगार देने वाली फैक्टरी निजी हाथों में सौंप दी गई और 950 से अधिक लोग बेरोजगार होकर मारे-मारे फिर रहे हैं। वहीं सल्ट के मोहान में संचालित दवा फैक्टरी के निजी हाथों में सौंपने की तैयारी होते ही 300 लोगों की रोजी-रोटी पर संकट मंडरा गया है।
रानीखेत में स्थापित दवा फैक्टरी की राज्य गठन से पूर्व देश-दुनिया में अलग पहचान थी। 80 के दशक तक फैक्टरी में करीब 1000 कामगार नौकरी कर रोजगार से जुड़े थे। राज्य गठन के बाद हिमालयी जड़ी बूटियों का संरक्षण और आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण करने वाली यह सरकारी दवा फैक्टरी अपना अस्तित्व नहीं बचा सकी और 2023 में इसे निजी हाथों में सौंप दिया गया। अब यहां मात्र 15 कर्मचारियों की तैनाती है और 985 लोगों से रोजगार छिन गया। वहीं मोहान में स्थापित 300 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाली दवा फैक्टरी आईएमपीएल को भी निजी हाथों में सौंपने की तैयारी अंतिम चरण में है, इसका लंबे समय से विरोध हो रहा है। यदि इस फैक्टरी का निजीकरण हुआ तो की लोगों का रोजगार छिनना तय है। जिले में स्थापित उद्योग दम तोड़ रहे हैं और रोजगार के लिए लोग मारे-मारे फिर रहे हैं,लेकिन नए उद्योग स्थापित कर रोजगार के द्वार खोलने के दावे जरूर हो रहे हैं। संवाद
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आयुर्वेदिक दवा के लिए प्रसिद्ध थी रानीखेत की गनियाद्योली फैक्टरी
अल्मोड़ा। 1954 में गनियाद्योली में ड्रग फैक्टरी की स्थापना की गयी। फैक्टरी के पास ही भेषज विकास संघ की भूमि पर जड़ी बूटियों का उत्पादन कर इससे च्यवनप्राश, आसव, अशोकारिस्ट, त्रिफला, गुगुल, गंधक रसायन, अभ्रक भष्म, लवण भास्कर चूर्ण, आसव बटिया सहित उदर रोगों से संबंधित 200 से अधिक प्रकार की दवाइयां बनाईं जाती थीं। राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि उत्तराखंड राज्य के कई श्रमिकों को फैक्ट्री में नौकरी दी जाएगी, लेकिन धीरे-धीरे सरकारी मशीनरी की उपेक्षा के कारण फैक्टरी अपने अस्तित्व को नहीं बचा सकी और इसका निजीकरण हो गया। जड़ी बूटियों का उत्पादन भी ठप हो गया। अब फैक्टरी को जड़ी बूटियों के लिए दिल्ली, हरिद्वार, हाथरस सहित अन्य प्रदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
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कभी लोगों की जिंदगी बचाने वाली दवा फैक्टरी पड़ी है वीरान
अल्मोड़ा। कभी लोगों की जिंदगी बचाने के साथ ही 400 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाली दवा फैक्टरी वीरान पड़ी है। अल्मोड़ा के पातालदेवी में आल्पस फार्मास्यूटिकल्स दवा कंपनी 1975 में स्थापित की गई। यहां बनने वाली दवाइयां उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के अलावा कई राज्यों में सप्लाई होती थीं। वहीं यह कंपनी सैकड़ों स्थानीय लोगों के परिवारों का पेट भर रही थी। अब फैक्ट्री बंद हो चुकी है और इससे जुड़े काफी लोग आज भी बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। इस कंपनी में 2017 में ताले लटक गए, जो अब तक नहीं खुल सके हैं।