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कुमाऊंनी गद्य में खसपर्जिया भाषा में ज्यादा ध्यान दिणें जरूरत
अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा
Updated Fri, 03 Nov 2017 10:55 PM IST
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कुमाऊंनी भाषा अघिल हुं नि बढ़ सक यैक लिजि साहित्यकार उत्तराखंड सरकार दगण यांक विधायक, सांसद कैं दोष दिनी। उनर मानण छ कि कुमाऊंनी भाषा में दस और गढ़वालि भाषा में आठ प्रकार छन। और यो द्वी भाषान में लेखणी वाल साहित्यकार लै ज्यादा छन, लेकिन कुमाऊंनी भाषा कैं अघिल बढूना लिजि हमर राज्य में न तो कुमाऊंनी भाषा परिषद छ और न कुमाऊंनी एकेडमी। 2011 में सरकारल भाषा संस्थान खोलो, लेकिन उ संस्थान लै बंद हैगो।
कुमाऊंनी साहित्यकार मानण छ कि आब कुमाऊंनी भाषा कैं आर्थिक तौर पर जोड़नक जरूरत छ। दिल्ली बटि अल्माड़ पुजि कुमाऊंनी साहित्यकार और सेवानिवृत्त स्वास्थ्य शिक्षक पूरन चंद्र कांडपाल कुमाऊंनी भाषा कैं वीक स्थान नि मिलण वील भौते दुखी छन।
उनर मानण छ कि कुमाऊंनी भाषा कवितानक जोर ज्यादा छ, लेकिन यैक बदाव अगर कुमाऊंनी भाषा में नाटक, उपन्यास, कहानी, संस्मरण या खंड काव्य पर ज्यादा जोर दी जौ त यो कुमाऊंनी भाषाक लिजि भल बाट होल।
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सत्तर वर्षीय कांडपाल ज्यू बतूनी कि कुमाऊंनी में खसपर्जिया, चौराबैसी, सोराली, गंगोई, चौगर्खिया, दन पुरिया, पछाई, अस्कोटी, र्कु्रमय्या और सिराली दस प्रकार छन, लेकिन गद्य में खस पर्जिया भाषा में ज्यादा ध्यान दिणें जरूरत छ। बल्कि पद्य में कुमाऊंनी भाषाक अन्य नौ प्रकारन में बटि क्वे में लै कविता बढ़ सकूं।
संविधान में 24 भाषा छन, जमें 16 और 17 नंबर पर कुमाऊंनी, गढ़वालि भाषाक नाम हुण चैंछी। कांडपाल ज्यू माननी कि यो दुर्भाग्य छ कि उत्तराखंड में आठ सांसद और 70 विधायक हबेर लै कुमाऊंनी और गढ़वालि कैं भाषाक दर्ज नि मिल सक।
कांडपाल ज्यूक कुमाऊंनी में लिखी 10 किताब बाजार में ए गेईं जमैं कहानी संग्रह, उपन्यास, कविता, निबंध, जीवनी और परमवीर चक्र, नोबल पुरस्कार और भारत रत्न लोगनक बार में लिखी एक किताब शामिल छ। कांडपाल ज्यूल उत्तराखंड सामान्य ज्ञान कैं लिबेर पैल किताब लै निकाल राखी।
दुहार साहित्यकार भैरव दत्त पांडे ज्यू लै माननी कि प्राइमरी बटि डिग्री कॉलेज तक कुमाऊंनी भाषा विषय खोलणक और प्रतियोगी परीक्षान में कुमाऊंनी भाषा प्रश्र हुंण चैं।
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कुमाऊंनी साहित्यकार मानण छ कि आब कुमाऊंनी भाषा कैं आर्थिक तौर पर जोड़नक जरूरत छ। दिल्ली बटि अल्माड़ पुजि कुमाऊंनी साहित्यकार और सेवानिवृत्त स्वास्थ्य शिक्षक पूरन चंद्र कांडपाल कुमाऊंनी भाषा कैं वीक स्थान नि मिलण वील भौते दुखी छन।
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उनर मानण छ कि कुमाऊंनी भाषा कवितानक जोर ज्यादा छ, लेकिन यैक बदाव अगर कुमाऊंनी भाषा में नाटक, उपन्यास, कहानी, संस्मरण या खंड काव्य पर ज्यादा जोर दी जौ त यो कुमाऊंनी भाषाक लिजि भल बाट होल।
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सत्तर वर्षीय कांडपाल ज्यू बतूनी कि कुमाऊंनी में खसपर्जिया, चौराबैसी, सोराली, गंगोई, चौगर्खिया, दन पुरिया, पछाई, अस्कोटी, र्कु्रमय्या और सिराली दस प्रकार छन, लेकिन गद्य में खस पर्जिया भाषा में ज्यादा ध्यान दिणें जरूरत छ। बल्कि पद्य में कुमाऊंनी भाषाक अन्य नौ प्रकारन में बटि क्वे में लै कविता बढ़ सकूं।
संविधान में 24 भाषा छन, जमें 16 और 17 नंबर पर कुमाऊंनी, गढ़वालि भाषाक नाम हुण चैंछी। कांडपाल ज्यू माननी कि यो दुर्भाग्य छ कि उत्तराखंड में आठ सांसद और 70 विधायक हबेर लै कुमाऊंनी और गढ़वालि कैं भाषाक दर्ज नि मिल सक।
कांडपाल ज्यूक कुमाऊंनी में लिखी 10 किताब बाजार में ए गेईं जमैं कहानी संग्रह, उपन्यास, कविता, निबंध, जीवनी और परमवीर चक्र, नोबल पुरस्कार और भारत रत्न लोगनक बार में लिखी एक किताब शामिल छ। कांडपाल ज्यूल उत्तराखंड सामान्य ज्ञान कैं लिबेर पैल किताब लै निकाल राखी।
दुहार साहित्यकार भैरव दत्त पांडे ज्यू लै माननी कि प्राइमरी बटि डिग्री कॉलेज तक कुमाऊंनी भाषा विषय खोलणक और प्रतियोगी परीक्षान में कुमाऊंनी भाषा प्रश्र हुंण चैं।