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प्राकृतिक खेती की ओर महिलाओं के बढ़ रहे कदम

Tue, 01 Feb 2022 01:24 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 01 Feb 2022 01:24 AM IST
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Women's steps towards natural farming
सेवापुरी। नीति आयोग द्वारा चयनित मॉडल ब्लॉक सेवापुरी में प्राकृतिक खेती की ओर महिलाओं के कदम बढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री से पुरस्कृत महिला किसान सुमन देवी महिलाओं को प्रशिक्षित करने के साथ उन्हें प्राकृतिक खेती की ओर मोड़ रही हैं। सुमन देवी ने अब तक कई गांवों के महिला किसानों को हुनरमंद बना चुकी हैं।
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सरकार की ओर से किसानों को प्राकृतिक खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
कृषि विभाग और आईसीआईसीआई फाउंडेशन की पहल पर मुख्यमंत्री द्वारा पुरस्कृत विकासखंड के मड़ैया गांव निवासी प्रगतिशील महिला किसान सुमन पटेल गांव-गांव जाकर महिलाओं को प्राकृतिक खेती के गुर सिखा रही हैं। खासकर यह प्रशिक्षण महिला समूूह को दिया जा रहा है। जिससे महिलाएं खेती के काम में आगे आएं और परिवार के लोगों की मदद कर सकें।
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सुमन देवी ने बताया कि दशप्राणी अर्क और जीवामृत अर्क से बिना रासायनिक खाद प्रयोग किए बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है। इस उत्पादित फसल स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद भी है। उन्होंने बताया कि अब सौ से ज्यादा महिलाओं को प्रशिक्षण देकर हुनरमंद बनाया जा चुका है। अब तक विकासखंड के मटुका, खरगूपुर पूरे बरियार मड़ैया बरकी सहित विभिन्न गावों के किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
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ऐसे बनता है दशप्राणी अर्क
दशप्राणी अर्क दस प्रकार के वनस्पतियों के पत्तों को मिलाकर बनाया जाता है। इसमें धतूरा, मदार, मिर्च आदि प्रमुख होते हैं। इसका उपयोग खड़ी फसलों जैसे बैगन मिर्च सरसों आदि पर कीड़ों को मारने के लिए किया जाता है। इससे फसल सुरक्षित रहती है और पैदावार दोगुनी होती है। यह अर्क 40 दिनों में बनकर तैयार हो जाता है और छह माह तक स्टोर किया जा सकता है।

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जीवामृत बढ़ाता है उत्पादन
जीवामृत एक अत्यधिक प्रभावशाली जैविक खाद है। इसे गोबर के साथ पानी में कई और पदार्थ जैसे गौमूत्र, बरगद या पीपल के नीचे की मिटटी, गुड़ और दाल का आटा मिलाकर तैयार किया जाता है। यह जीवामृत पौधों की वृद्धि और विकास के साथ साथ मिट्टी की संरचना सुधारने में काफी मदद करता है। यह पौधों की विभिन्न रोगाणुओं से सुरक्षा करता है तथा प्रतिरक्षा क्षमता को भी बढ़ाने का कार्य करता है। जिससे पौधे स्वस्थ बने रहते हैं तथा फसल से बहुत ही अच्छी पैदावार मिलती है। फसल को दी जाने वाली प्रत्येक सिंचाई के साथ 200 लीटर जीवामृत का प्रयोग प्रति एकड़ की दर से उपयोग किया जा सकता है।
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