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काशी में गणतंत्र के गवाह... : क्रांतिकारियों की जासूसी करने वाली चौक थाने की पुलिस अब करवा रही दर्शन

Sun, 26 Jan 2025 01:45 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sun, 26 Jan 2025 01:45 PM IST
सार

देश की आजादी में बनारस और यहां के लोगों का भी प्रमुख योगदान रहा है। एक समय था जब क्रांतिकारियों का दूसरा घर बनारस हुआ करता था। यहां छिपे भारत मां के सपूतों की जासूसी भी होती थी। यहां ऐसे कई तथ्य और इमारतें हैं, जो भारत की आजादी का हिस्सा बनी थीं।

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Witnesses of Republic in Kashi Chowk police station spied on revolutionaries now providing darshan
वाराणसी स्थित चाैक थाना। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी का टाउन हॉल, कलेक्ट्रेट, थाना चौक-कैंट, वाराणसी जंक्शन, बीएचयू बिड़ला हॉस्टल का जनतंत्र वृक्ष गणतंत्र के जीते-जागते गवाह हैं। बीएचयू का जनतंत्र वृक्ष और देश का गणतंत्र दोनों की उम्र एक बराबर 76 साल ही है। 

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अंग्रेजी हुकूमत की डांस-पार्टी क्लब का चोला उतारकर क्रांतिकारियों और कवियों का मंच बनने वाला टाउन हॉल अब शहरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। यहां नगर निगम सदन की कार्यवाही और बैठक होती है। क्रांतिकारियों को प्रताड़ित करने वाली चर्चनुमा चौक थाने की पुलिस तो अब बाबा विश्वनाथ के भक्तों के दर्शन-पूजन की व्यवस्था देख रही है। आइए, जानते हैं काशी के उन स्थानों की कहानी जो गणतंत्र को जोड़ते हैं।

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टाउन हॉल में शहरी लोकतंत्र की बहस
विजयानगरम साम्राज्य के महाराज ने 19वीं शताब्दी में मैदागिन का प्रसिद्ध टाउन हॉल बनवाया था। अंग्रेजों के डांस और पार्टियों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था। यहां पर बड़े-बड़े झूमर लगे थे। बाद में इसका चोला उतारकर कवियों और क्रांतिकारियों का मंच बना दिया गया। अब यहां नगर निगम के सदन की बैठक होने लगी।  

सीता-अशोक के साथ बढ़ा गणतंत्र
बीएचयू के बिड़ला हॉस्टल में सीता-अशोक का पेड़ गणतंत्र के जन्म का गवाह है। 1950 में दिल्ली में गणतंत्र की घोषणा और बीएचयू में छात्रों और प्रोफेसरों द्वारा सीता-अशोक का पौधा रोपा गया। इसे जनतंत्र का नाम दिया गया। यहां पर शिलापट्ट पर रोपने की तिथि भी लिखवाई गई। हॉस्टल तीन भाग में बंटा, लेकिन जनतंत्र का वृक्ष आज भी डटकर खड़ा है

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Witnesses of Republic in Kashi Chowk police station spied on revolutionaries now providing darshan
मैदागिन स्थित टाउन हाॅल। - फोटो : अमर उजाला

2 प्लेटफाॅर्म से अब 11 प्लेटफाॅर्म तक
गणतंत्र के गवाह के रूप में वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन भी है, जिसे पहले सिकरौल के नाम से जाना जाता था। 1862 के इस जंक्शन से माल परिवहन के अलावा छोटी लाइन की ट्रेनें चलती थी। अंग्रेजों के जमाने में स्थापित यह स्टेशन 1956 के बाद पंडित कमलापति त्रिपाठी ने इसका कायाकल्प किया। वर्तमान में 11 प्लेटफाॅर्म हैं। 112 जोड़ी से अधिक यात्री ट्रेनें कैंट से गुजरती हैं।

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चौक थाना : अंग्रेजी सेना के अधिकार में था  
अंग्रेजी पुलिस ने पहली बार चंद्रशेखर आजाद को इसी चौक थाने के पास से गिरफ्तार किया था। तब का चौक थाना अंग्रेजी सेना के अधिकार में था और क्रांतिकारियों और श्रद्धालुओं की जासूसी कराता था। आज पुलिस विश्वनाथ मंदिर के श्रद्धालुओं की दर्शन-व्यवस्था देखती है। 

अंग्रेजों के जमाने में थी राजाओं की कचहरी
चार लाख की आबादी वाले इस काशी के कलेक्ट्रेट और आज के जिला मुख्यालय पर झंडारोहण किया गया। जौनपुर, गाजीपुर, भदोही और चंदौली इसी बनारस का हिस्सा थे। इसे अंग्रेजों के जमाने में राजाओं की कचहरी कही जाती थी। 

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