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यह तीसरा आदमी कौन है और मेरे देश की संसद मौन है...

Thu, 10 Feb 2022 12:05 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 10 Feb 2022 12:05 AM IST
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Who is this third man and my country's parliament is silent...
वाराणसी। ‘एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी खाता है। एक तीसरा आदमी भी है, जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है। वह सिर्फ रोटी से खेलता है। मैं पूछता हूं, यह तीसरा आदमी कौन है और मेरे देश की संसद मौन है...’ सुदामा पांडेय धूमिल की कविता के शब्द समाज के यथार्थ का कड़वा सच सामने रखते हैं।
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क्रांतिकारी विचारधारा वाले कवि धूमिल जिन्होंने विरोधी कविताएं लिखीं और हिंदी कविता के एंग्री यंग मैन का खिताब उनको दिया। 10 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि मनाई जाएगी। कथाकार ‘काशीनाथ सिंह’ के अनुसार, उच्च शिक्षा से महरूम धूमिल, कविता सीखने-समझने के लिए आजीवन विद्यार्थी बने रहे। अंग्रेजी की कविताएं पढ़ने-समझने के लिए उन्होंने पड़ोसी नागानंद और विभिन्न शब्दकोशों की मदद से अंग्रेजी सीखी। उनकी प्रतिभा के अनुरूप ना सम्मान मिला, न प्रचार-प्रसार।
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प्रशंसकों के अलावा, आलोचकों ने भी उनके साहित्य को अनदेखा किया और बहुत विलंब से पहचाना, जो पाठकों का दुर्भाग्य कहा जाएगा। धूमिल की रचनाएं पढ़ते हुए पाठकों का स्वयं को उन विचारों-भावों के निकटस्थ पाने की विशेषताओं के कारण ही धूमिल सच्चे जनकवि कहलाए। धूमिल की कविताओं के माध्यम से उनको समझना, सत्य से साक्षात्कार करना है।
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नवगीतकार सुरेंद्र वाजपेयी ने बताया कि धूमिल आत्मकथ्यों में अक्सर जिस अनिश्चित मृत्यु को संभव बताते थे, वो दबे पांव आई। धूमिल का रहन-सहन इतना साधारण था कि रेडियो पर उनके निधन की खबर प्रसारित होने पर उनके परिजनों को ज्ञात हुआ कि ‘धूमिल’ कितने बड़े कद के कवि थे। मणिकर्णिका घाट पर अंत्येष्टि के समय सिर्फ कवि कुंवर नारायण और श्रीलाल शुक्ल पहुंचे थे। 10 फरवरी, 1975 को हिंदी साहित्याकाश का ये अनोखा जनप्रिय कवि सदा के लिए ब्रह्मलीन हो गया। खेवली गांव में नौ नवंबर 1936 को उनका जन्म हुआ था। 11 वर्ष की अवस्था में पिता के निधन के बाद अभावों के बीच हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण और 12 वर्ष में विवाह हो गया। पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए कोलकाता पहुंचे और वहां मजदूरी की। 1958 में विद्युत संबंधी कार्यों का डिप्लोमा किया और वहीं अनुदेशक नियुक्त हो गए। नौकरी के सिलसिले में वे बलिया, सहारनपुर, सीतापुर आदि जगहों पर रहे पर मन बनारस में ही रमता था।
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