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Varanasi News: जहां पत्थर भी बनते हैं शिवलिंग... काशी में पुनर्जीवित हुआ 125 विभूतियों का साहित्य

Thu, 23 Jul 2026 01:46 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 23 Jul 2026 01:46 AM IST
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Where even stones become Shivlings... the literature of 125 luminaries has been revived in Kashi.
नागरी नाटक मंडली में सोच विचार काशी अंक 17 पुस्तक का लोकार्पण करते अतिथि। अमर उजाला
कबीरचौरा स्थित नागरी नाटक मंडली सभागार में बुधवार को साहित्यिक पत्रिका सोच-विचार के 17वें संस्करण का लोकार्पण समारोह संपन्न हुआ। कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने बनारस की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊर्जा पर बल देते हुए कहा कि काशी एक ऐसी पवित्र ज्ञानभूमि है, जहां पहुंचते ही व्यक्ति की सुप्त एवं सुप्तप्राय सृजनात्मक प्रतिभा स्वतः जागृत हो उठती है। उन्होंने कहा कि आज के तकनीकी दौर में लोग जल्दबाजी में फैसले ले रहे हैं और मौलिक चिंतन की कमी दिखती है।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य पद्मभूषण प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि काशी साधारण नगर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। यह पत्रिका दिवंगत साहित्यकारों के अनछुए संस्मरणों को पाठकों तक पहुंचाने का एक अद्वितीय प्रयास है। जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया की पूर्व कुलपति डॉ. कल्पलता पांडेय ने सुंदर उपमा देते हुए कहा कि जिस प्रकार मां गंगा के स्पर्श से एक साधारण पत्थर भी पूजनीय शिवलिंग बन जाता है, उसी प्रकार बनारस की पावन धारा साहित्य और कला को निखार देती है। अतिथि संपादक वाचस्पति ने बताया कि इस 17वें विशेषांक में बनारस से जुड़ी 125 महान हस्तियों के संस्मरणों को सहेजा गया है। दिवंगत दिग्गजों के बारे में प्रामाणिक तथ्य जुटाना काफी चुनौतीपूर्ण कार्य रहा। पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि संस्था का उद्देश्य बनारस की साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत के हर पहलू को सहेजना है।
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समारोह का शुभारंभ डॉ. विजयेंद्र नाथ मिश्र के मंगलाचरण और बालसाधक सार्थक के शंखनाद से हुआ। संचालन अरविंद मिश्र हर्ष ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. उमेश प्रसाद सिंह ने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर शहर के अनेक वरिष्ठ साहित्यकार, विद्वान और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।
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इतिहास में कई महान साधक ओझल रह गए : डॉ. नीरजा माधव
विशिष्ट अतिथि एवं विख्यात साहित्यकार डॉ. नीरजा माधव ने कहा कि इतिहास में अक्सर चुनिंदा दृष्टिकोण को ही जगह मिली, जिससे कई महान साधक ओझल रह गए। इसमें पसंद और वैचारिकी को प्राथमिकता दी गई। सोच-विचार ने ऐसे गुमनाम कला-साधकों के योगदान को सामने लाकर एक ऐतिहासिक काम किया है।
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