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वट सावित्री व्रत: महिलाओं ने रखा अडिग व्रत, सौभाग्यवती के लिए की यमदेव की पूजा; यहां पढ़ें रोचक कथा
Thu, 06 Jun 2024 01:56 PM IST
अमन विश्वकर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
Published by: अमन विश्वकर्मा
Updated Thu, 06 Jun 2024 01:56 PM IST
सार
Varanasi News: महिलाओं ने पूजन कर पति ने आशीर्वाद लिया। इस दिन महिलाएं व्रत भी रखतीं हैं। पुराणों के अनुसार, इस व्रत का भी विशेष लाभ मिलता है। काशी के मंदिरों में भी महिलाओं ने पूजन-अर्चन किया। उन मंदिरों में ज्यादा भीड़ रहीं, जहां बरगद का पेड़ था।
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वट का पूजन करतीं महिलाएं।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
आस्था की नगरी काशी में गुरुवार की सुबह से ही महिलाओं ने पूजन-अर्चन शुरू कर दिया था। दिन है वट-सावित्री व्रत का। महिलाओं ने बरगद के पेड़ में नारा लपेटकर पति के लंबी आयु के प्रति विशेष प्रार्थना की। वट सावित्री सौभाग्य प्राप्ति के लिए बड़ा और अडिग व्रत माना जाता है।
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पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं अखंड सौभाग्य प्राप्त करने के लिए वट सावित्री व्रत रखकर वट वृक्ष तथा यमदेव की पूजा करती हैं। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक एवं पर्याय बन चुका है। वट सावित्री व्रत में वट और सावित्री, दोनों का विशेष महत्व है।
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वट सावित्री व्रत कथा
कथा के अनुसार सावित्री राजा अश्वपति की पुत्री थी, जिसे राजा ने बहुत कठिन तपस्या करने के उपरांत देवी सावित्री की कृपा से प्राप्त किया था। इसलिए राजा ने उनका नाम 'सावित्री ' रखा था। सावित्री बहुत गुणवान और रूपवान थी, लेकिन उसके अनुरूप योग्य वर न मिलने के कारण सावित्री के पिता दुखी रहा करते थे, इसलिए उन्होंने अपनी कन्या को स्वयं अपना वर तलाश करने भेज दिया।
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इस तलाश में एक दिन वन में सावित्री ने सत्यवान को देखा और उसके गुणों के कारण मन में ही उसे वर के रूप में वरण कर लिया। सत्यवान साल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे, लेकिन उनका राज्य किसी ने छीन लिया था और काल के प्रभाव के कारण सत्यवान के माता- पिता अंधे हो गये थे।
सत्यवान व सावित्री के विवाह से पूर्व ही नारद मुनि ने यह सत्य सावित्री को बता दिया था कि सत्यवान अल्पायु है, अतः वह उससे विवाह न करे। यह जानते हुए भी सावित्री ने सत्यवान से विवाह करने का निश्चय किया और देवर्षि नारद से कहा -"भारतीय नारी जीवन में मात्र एक बार पति का वरण करती है, बारंबार नहीं। अतः मैंने एक बार ही सत्यवान का वरण किया है और यदि उसके लिए मुझे मृत्यु से भी लड़ना पड़े तो मैं यह करने को तैयार हूं।
उसकी मृत्यु का समय निकट आने पर मृत्यु से तीन दिन पूर्व ही सावित्री ने अन्न-जल का त्याग कर दिया। मृत्यु वाले दिन जंगल में जब सत्यवान लकड़ी काटने के लिए गए तो सावित्री भी उनके साथ गई और जब मृत्यु का समय निकट आ गया तथा सत्यवान के प्राण हरने लिए यमराज आये तो सावित्री भी उनके साथ चलने लगी। यमराज के बहुत समझाने पर भी वह वापस लौटने को तैयार नहीं हुई। तब यमराज ने उससे सत्यवान के जीवन को छोड़कर अन्य कोई भी वर मांगने को कहा।
उस स्थिति में सावित्री ने अपने अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति और ससुर का खोया हुआ राज्य मांग लिया, किंतु वापस लौटना स्वीकार न किया। उसकी अटल पतिभक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने जब पुनः उससे वर मांगने को कहा, तो उसने सत्यवान के पुत्रों की मां बनने का बुद्धिमत्तापूर्ण वर मांगा, यमराज के तथास्तु कहते ही मृत्यु पाश से मुक्त होकर वटवृक्ष के नीचे पड़ा हुआ सत्यवान का मृत शरीर जीवित हो उठा। तब से अखंड सौभाग्य प्राप्ति के लिए इस व्रत की परंपरा आरंभ हो गयी और इस व्रत में वट वृक्ष व यमदेव की पूजा का विधान बन गया।