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तीन घरों के इकलौते चिराग गंगा में डूबे, एक दिन पहले ईद की दावत में कहा था- यादगार रहेगा यह पल

Sat, 30 May 2020 01:08 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sat, 30 May 2020 01:08 PM IST
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तौसीफ दोस्तों के साथ। - फोटो : अमर उजाला।

वाराणसी में गंगा में तीन घरों के इकलौते चिराग गंगा के पानी में डूब गए। कुछ इसी तरह की बातें शुक्रवार को दोपहर वारीगढ़ही और वाजिदपुर सीवान मोहल्ले के लोगों की जुबान पर थी। चार किशोर और एक नवयुवक की रामनगर के सिपहिया घाट में गंगा में डूबने से हुई मौत के बाद उनके परिजन ही नहीं बल्कि मोहल्ले और आसपास के इलाकों के लोग भी खासे दुखी दिखे। पांचों दोस्तों की मौत से इलाके की दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिर गए और कई घरों के चूल्हे तक नहीं जले। लोगों की जुबान पर बस एक ही बात थी कि अरे ई सब कइसे हो गवा...?

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वाराणसी के वारीगढ़ही निवासी तौसीफ के दोस्त आसिफ ने बताया कि उसका साथी बुनकरी का काम करता था और टोटो(ई-रिक्शा) भी चला लेता था। आठवीं तक हम साथ ही पढ़े थे। बृहस्पतिवार को तौसीफ अपने घर पर बुलाया था। कह रहा था कि लॉकडाउन चल रहा है। इस बार ईद पर कहीं घूमने भी नहीं जा पाए। इसके बाद उसने सेल्फी ली और कहा कि यह पल यादगार रहेगा कि घर में ही ईद मनानी पड़ी।
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आसिफ ने बताया कि बृहस्पतिवार को ही तौसीफ कह रहा था कि सभी लोग गंगा नहाने चलते हैं। उसे मना किया गया लेकिन शायद मौत ही पांचों को वहां खींचकर ले गई। वहीं, सैफ के भाई आफताब ने बताया कि सिपहिया घाट पर सभी तफरीह करने जरूर जाते थे लेकिन कोई गंगा में नहीं नहाता था। शायद ऐसा बुरा दिन देखना लिखा था, इसी वजह से सब गंगा के पानी में उतर गए। उधर, वारीगढ़ही मोहल्ले के लोगों का कहना था कि सिपहिया घाट में चोर बालू है और इतना उतार-चढ़ाव है कि पानी का जायजा नहीं लग पाता। इसी वजह से पांचों बच्चे हादसे का शिकार हुए।

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पिता दुबई में और चाचा बाहर, हम किसे-क्या समझाएं
लकी की मौत की खबर सुनकर उसके बाबा मोहम्मद रेयान खान बेसुध हो गए। मोहल्ले के लोग उन्हें संभाले हुए थे। मोहम्मद रेयान ने बताया कि लकी के पिता दुबई में नौकरी करते हैं। उसके चाचा भी बाहर रहते हैं। घर में मैं अकेला लकी की मां को कैसे और क्या समझाऊं। दुबई से बेटा हर दो मिनट पर फोन कर रहा है कि अब्बा क्या हुआ, लकी अब कैसा है। लकी इस साल कक्षा आठ की पढ़ाई पूरी कर नौवीं में गया था। किसी चीज की कोई कमी नहीं है। न जाने किसका क्या बिगड़ा था कि ऊपर वाले ने बुढ़ापे में ऐसा जख्म दिया है।    

परिजनों को नहीं पता था कि कहां गए हैं बच्चे  
बच्चों की जल्दबाजी और मनमानी परिजनों के जीवन भर के लिए नासूर जख्म बन जाती है। रामनगर कस्बे में गंगा में डूबने वाले बच्चों के मामले में भी ऐसा ही हुआ। पांचों में से किसी के परिजन को यह नहीं पता था कि वह आखिरकार कहां गए हुए हैं। सभी के परिजन यही मान रहे थे कि उनके बच्चे मोहल्ले में ही किसी के घर में होंगे। पांचों बच्चों के गंगा में डूबने की खबर उनके परिजनों को मिली तो सभी के पैर के नीचे से जमीन खिसक गई और सभी सब कुछ छोड़ कर सिपहिया घाट की ओर भागे।

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