जिपं अध्यक्ष चुनावः पूर्वांचल में कमल खिला, ढह गया सपा का किला, जानिए अखिलेश यादव की पार्टी क्यों पड़ी कमजोर
विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माने जाने वाले जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव के मैदान में भाजपा की ही दबदबा रहा। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के नतीजों के बाद पूर्वांचल में उम्मीदों को परवान दे रही समाजवादी पार्टी को जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में करारी शिकस्त मिली है।
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त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के नतीजों के बाद पूर्वांचल में उम्मीदों को परवान दे रही समाजवादी पार्टी को जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में करारी शिकस्त मिली है। पंचायत सदस्यों के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद आपसी कलह और फूट की वजह से समाजवादी पार्टी पस्त नजर आ रही है। कई जिलों में बहुमत के करीब सदस्य होने के बाद भी सपा उन्हें सहेज नहीं पाई और भाजपा ने आसानी से उन्हें अपने पाले में कर लिया।
जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में नतीजों ने साफ कर दिया है कि भाजपा की जड़े गहरी हैं। हालांकि, मजबूत गढ़ आजमगढ़ और बलिया में सपा ने अपने अध्यक्ष निर्वाचित कराकर पूरब में लाज बचाई है। पूर्वांचल के 10 जिलों में भाजपा छह, सपा दो, अपना दल एक और एक निर्दलीय जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं।
स्नातक और शिक्षक एमएलसी चुनाव में पटखनी खा चुकी सत्तासीन भाजपा पंचायत चुनाव में पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरी। हालांकि पंचायत सदस्यों के चुनाव में सपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा और मिर्जापुर, चंदौली, सोनभद्र और जौनपुर में तो सपा बहुमत के करीब थी। मगर, धनबल और बाहुबल के चुनाव में भाजपा की सधी रणनीति कई मायनों में कारगर रही।
भदोही में अंतिम समय में समर्थन वापस लेना और मिर्जापुर में बसपा से जीते सदस्य पर दांव लगाकर भाजपा ने जिताऊ चेहरे पहले ही तलाश लिए थे। वाराणसी में सपा प्रत्याशी का नामांकन खारिज होने के बाद पूनम मौर्य और मऊ में सपा प्रत्याशी बने रामनगीना यादव के नामांकन नहीं करने से यहां मनोज राय के रूप में भाजपा का परचम लहराया।
भदोही में भी सपा प्रत्याशी श्याम कुमारी मौर्य नामांकन के लिए नहीं पहुंचीं। भाजपा ने यहां अमित कुमार प्रिंस पर दांव लगाया था, लेकिन यहां भाजपा विधायक रविंद्र त्रिपाठी के भाई निर्दलीय अनिरुद्ध त्रिपाठी की मजबूत पैठ देखकर पार्टी ने अंतिम समय में प्रिंस से समर्थन वापस ले लिया था। अनिरुद्ध को भी अब भाजपा अपना मान रही है। इन जिलों में सपा शुरू से ही अपनी रणनीति बनाने में असफल साबित हुई। यही कारण है कि यहां के जिलाध्यक्ष तत्काल पदमुक्त कर दिए गए थे।
संख्या बल के बाद बिखर गया कुनबा
चंदौली, सोनभद्र, मिर्जापुर और जौनपुर में सपा की स्थिति काफी मजबूत थी। चंदौली की 35 सीटों में सपा ने 12 सीटें जीती थी। अध्यक्ष पद के दावेदार तेज नारायण यादव सहित दो बागियों के भी सपा में होने का दावा था। मगर, यहां सपा को महज पांच वोट मिले और भाजपा के दीनानाथ शर्मा 25 मतों से विजयी हुए। ऐसे ही 40 सीटों वाले मिर्जापुर में सपा 20 सदस्यों का दावा करती रही।
मगर, भाजपा प्रत्याशी ने 36 मत पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी सपा की आशा देवी को 32 मतों से पराजित किया। अपना दल एस के खाते में गई 31 सदस्यों वाले सोनभद्र में सपा 17 सदस्यों के समर्थन का दावा करती रही। मगर उसे महज 12 वोट मिले। जबकि अपना दल की संयुक्त प्रत्याशी राधिका पटेल को 19 मत मिले। 83 सीट वाले जौनपुर में सपा के पास 42 सीट का दावा था। मगर, बाहुबली पूर्व सांसद धनंजय सिंह के चक्रव्यूह में सपा और भाजपा दोनों फंसी। यहां उनकी पत्नी श्रीकला विजयी हुईं।
बलिया और आजमगढ़ ने बचाई सपा की लाज
बलिया में पूर्व मंत्री अंबिका चौधरी के बेटे आनंद चौधरी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ में विजय यादव ने पार्टी की लाज बचाई है। बलिया में 58 में सपा के महज 10 सदस्य जीते थे और भाजपा यहां प्रत्याशी चयन के साथ गुटबाजी में मात खा गई। आजमगढ़ में भी 84 में सपा को 79 मत मिले। जबकि यहां भाजपा के 11 सदस्य जीते थे। लेकिन, चंदौली में सपा की स्थिति खराब रही। यहां पूर्व सांसद रामकिशुन यादव के भतीजे तेज नारायण यादव को प्रत्याशी बनाने के बाद भी अपने कुनबे में बिखराव ने सपा की चिंता बढ़ाई है।