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कष्ट मिटाने वाला शंकुलधारा कुंड बर्बाद
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 01 Jun 2016 01:52 AM IST
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काशी की द्वारिकापुरी बदहाली के कगार पर है। इस तीर्थ की महिमा जितनी द्वारिकाधीश से है, उतनी ही वहां स्थित शंकुलधारा कुंड से। शंकुलधारा द्वापर में भगवान कृष्ण के हाथों शंकु-बंकु राक्षसों के वध के बाद उनके रुधिर के प्रवाह से उत्पन्न हुआ। इस कुंड के जल से चर्म रोग और कुष्ठ जैसी असाध्य बीमारियां दूर होने की धारणा है लेकिन अब पानी में सड़न पैदा हो गई है। प्रशासन ने इस कुंड में भी दुर्गापूजा, सरस्वती पूजा के दौरान प्रतिमाओं का विसर्जन करा दिया लेकिन अब भी मलबा उसी में भरा है। अब लोग इस कुंड के जल के इस्तेमाल से हिचकने लगे हैं।
शंकुलधारा कुंड के नाम पर मुहल्ला भी आबाद है। स्कंदपुराण के काशीखंड में भी इसका उल्लेख है। कहते हैं कि कभी द्वापर युग में शंकु और बंकु नामक दो राक्षसों का इस कदर आतंक था कि पृथ्वी कांप गई थी। उनके अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए देवी-देवताओं ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की।
कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने इसी स्थान पर शंकु और बंकु दोनों को मल्ल युद्ध में मार डाला। भगवान कृष्ण के प्रहार से शंकु-बंकु के शरीर से रुधिर की धारा बह निकली। उसी से वहां कुंड बन गया। इस कुंड में स्नान करने से चर्मरोग और अन्य ब्याधियां दूर होने की मान्यता है। पहले देश के कोने-कोने से लोग इस कुंड की महिमा सुनकर कष्ट दूर करने के लिए यहां आते थे। अब भी जब तब इस जल के इस्तेमाल की सलाह चर्मरोग से परेशान लोगों को दी जाती है लेकिन अब पानी स्पर्श के लायक नहीं रहा।
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भगवान कृष्ण ने शंकु-बंकु का वध कर इसी स्थान पर धरती के लोगों का दुख दूर किया था। अब वहां उसी धारणा को लेकर आषाढ़ शुक्ल पक्ष में कष्टहरिया का मेला लगता है। कष्टहरिया का मेला काशी की लोक चेतना का मेला है। इस मेले में आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी हजारों लोग आते हैं। कटहल के कोआ का भोग उस दिन भगवान द्वारिकाधीश को भक्त लगाते हैं।
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शंकुलधारा कुंड के नाम पर मुहल्ला भी आबाद है। स्कंदपुराण के काशीखंड में भी इसका उल्लेख है। कहते हैं कि कभी द्वापर युग में शंकु और बंकु नामक दो राक्षसों का इस कदर आतंक था कि पृथ्वी कांप गई थी। उनके अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए देवी-देवताओं ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की।
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कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने इसी स्थान पर शंकु और बंकु दोनों को मल्ल युद्ध में मार डाला। भगवान कृष्ण के प्रहार से शंकु-बंकु के शरीर से रुधिर की धारा बह निकली। उसी से वहां कुंड बन गया। इस कुंड में स्नान करने से चर्मरोग और अन्य ब्याधियां दूर होने की मान्यता है। पहले देश के कोने-कोने से लोग इस कुंड की महिमा सुनकर कष्ट दूर करने के लिए यहां आते थे। अब भी जब तब इस जल के इस्तेमाल की सलाह चर्मरोग से परेशान लोगों को दी जाती है लेकिन अब पानी स्पर्श के लायक नहीं रहा।
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भगवान कृष्ण ने शंकु-बंकु का वध कर इसी स्थान पर धरती के लोगों का दुख दूर किया था। अब वहां उसी धारणा को लेकर आषाढ़ शुक्ल पक्ष में कष्टहरिया का मेला लगता है। कष्टहरिया का मेला काशी की लोक चेतना का मेला है। इस मेले में आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी हजारों लोग आते हैं। कटहल के कोआ का भोग उस दिन भगवान द्वारिकाधीश को भक्त लगाते हैं।