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Varanasi News: खुदाबख्श लाइब्रेरी केवल पुस्तकालय नहीं, प्राथमिक स्रोतों का बड़ा भंडार
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पटना की खुदाबख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी और कोलकाता के फोर्ट विलियम कॉलेज में पुस्तक संरक्षण की दुर्लभ परंपरा पर बीएचयू में व्याख्यान हुआ। भारत अध्ययन केंद्र में खुदाबख्श लाइब्रेरी के सदस्य डॉ. जाकिर हुसैन ने कहा कि खुदाबख्श लाइब्रेरी के संग्रह में बनारस के जमींदारों और क्षेत्रीय इतिहास से संबंधित दुर्लभ पांडुलिपियां उपलब्ध हैं। इन स्रोतों के आधार पर इतिहासकारों ने बनारस और भारतीय इतिहास के कई पक्षों को स्पष्ट किया है। यह लाइब्रेरी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए केवल पुस्तकालय नहीं, बल्कि प्राथमिक स्रोतों का बड़ा भंडार है।
डॉ. हुसैन ने बताया कि लाइब्रेरी के संस्थापक मौलवी मो. बख्श ने दुर्लभ पुस्तकों और पांडुलिपियों का संग्रह शुरू किया, जिसे उनके पुत्र खुदाबख्श ने अपने जीवन का मिशन बनाया। फारसी, अरबी, उर्दू, संस्कृत, हिंदी, अवधी, तुर्की, पश्तो सहित कई भाषाओं की बहुमूल्य सामग्रियां एक ही स्थान पर संरक्षित हो पाईं। डॉ. हुसैन ने बताया कि संग्रह में मुगलकालीन मिनिएचर पेंटिंग्स के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। कुछ पांडुलिपियों में चित्र बनाने, रंग भरने और खाका तैयार करने वाले कलाकारों के नाम तक दर्ज हैं। उन्होंने 1834 की एक पेंटिंग का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राजा रवि वर्मा के जन्म से भी पहले की है।
फारसी लिपि में लिखीं गीता की पांडुलिपियां
डॉ. हुसैन ने बताया कि लाइब्रेरी में भागबद्गीता की हिंदी भाषा और फारसी लिपि में लिखी दुर्लभ पांडुलिपियां भी उपलब्ध हैं। संस्कृत में भगवद्गीता, अवधी में रामायण, मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत, राग-रागिनी, शाहनामा, विभिन्न मुगल, फारसी, तुर्की और मंगोल चित्रशैलियों से संबंधित पांडुलिपियां इसके संग्रह को विशिष्ट बनाती हैं।
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फोर्ट विलियम भारतीय भाषाओं के इतिहास का प्रयोगशाला
बीएचयू में हिंदी विभाग के प्रो. प्रभाकर सिंह ने कहा कि फोर्ट विलियम कॉलेज को केवल अंग्रेजी शासन के दौर में भारतीय भाषाओं के अध्ययन और पुस्तक-निर्माण की संस्था के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह भारतीय भाषाओं के इतिहास, अनुवाद, ज्ञान-निर्माण और हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी के संबंधों को समझने की प्रयोगशाला भी है।
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डॉ. हुसैन ने बताया कि लाइब्रेरी के संस्थापक मौलवी मो. बख्श ने दुर्लभ पुस्तकों और पांडुलिपियों का संग्रह शुरू किया, जिसे उनके पुत्र खुदाबख्श ने अपने जीवन का मिशन बनाया। फारसी, अरबी, उर्दू, संस्कृत, हिंदी, अवधी, तुर्की, पश्तो सहित कई भाषाओं की बहुमूल्य सामग्रियां एक ही स्थान पर संरक्षित हो पाईं। डॉ. हुसैन ने बताया कि संग्रह में मुगलकालीन मिनिएचर पेंटिंग्स के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। कुछ पांडुलिपियों में चित्र बनाने, रंग भरने और खाका तैयार करने वाले कलाकारों के नाम तक दर्ज हैं। उन्होंने 1834 की एक पेंटिंग का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राजा रवि वर्मा के जन्म से भी पहले की है।
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फारसी लिपि में लिखीं गीता की पांडुलिपियां
डॉ. हुसैन ने बताया कि लाइब्रेरी में भागबद्गीता की हिंदी भाषा और फारसी लिपि में लिखी दुर्लभ पांडुलिपियां भी उपलब्ध हैं। संस्कृत में भगवद्गीता, अवधी में रामायण, मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत, राग-रागिनी, शाहनामा, विभिन्न मुगल, फारसी, तुर्की और मंगोल चित्रशैलियों से संबंधित पांडुलिपियां इसके संग्रह को विशिष्ट बनाती हैं।
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फोर्ट विलियम भारतीय भाषाओं के इतिहास का प्रयोगशाला
बीएचयू में हिंदी विभाग के प्रो. प्रभाकर सिंह ने कहा कि फोर्ट विलियम कॉलेज को केवल अंग्रेजी शासन के दौर में भारतीय भाषाओं के अध्ययन और पुस्तक-निर्माण की संस्था के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह भारतीय भाषाओं के इतिहास, अनुवाद, ज्ञान-निर्माण और हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी के संबंधों को समझने की प्रयोगशाला भी है।