नन्हीं जान पर यहां भी खतरे का साया
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ऐसे स्कूल प्रबंधन, जिनकी अपनी बसें हैं वो तो बेहतर हालत में हैं लेकिन तमाम स्कूल प्रबंधनों ने किराये पर वाहनों की व्यवस्था की है। किराये के इन वाहनों की हालत खराब है। इन वाहनों में स्कूली बसें तो कम हैं लेकिन मैजिक, टेंपो, ऑटो, मारुति वैन, टैंपो ट्रैक्स, सुमो जैसे वाहनों की भरमार है। वाहन की फिटनेस सही न होने के साथ ही ओवरलोडिंग भी एक बड़ी समस्या है। फिटनेस और ओवरलोडिंग का ख्याल न तो स्कूल प्रबंधन रखते हैं न ही वाहन मालिक। खासकर गली-मोहल्ले में संचालित स्कूलों के वाहनों पर न तो स्कूल का नाम लिखा होता है और न ही ड्राइवर का नाम व नंबर। इनके लिए फर्स्ट एड बॉक्स, अग्निशमन यंत्र की तो बात ही बेमानी है।
स्कूल वाहन फिट हैं या नहीं, ड्राइवर के पास लाइसेंस है या नहीं, वाहन में फर्स्ट एड, अग्निशमन यंत्र है या नहीं, इसे चेक करना स्कूल की जिम्मेदारी तो है ही, अभिभावकों को भी जागरूक होने की जरूरत है। अपने बच्चे को वो जिस वाहन में भेज रहे हैं, उसकी फिटनेस सहित अन्य जानकारियां जरूर करें। किसी भी तरह की दिक्कत नजर आए या कोई सुझाव हों तो तत्काल स्कूल प्रबंधन को उससे अवगत कराना चाहिए।
आरटीओ की ओर से 20 से 22 जनवरी तक शहर भर में स्कूली वाहनों की चेकिंग का अभियान चलाया जाएगा। स्कूल वाहन के सुरक्षा संबंधी मानकों की चेकिंग की जाएगी। वाहन पर ड्राइवर का नाम और नंबर, उनका लाइसेंस, डीएन नंबर अंकित है या नहीं, वाहन में फर्स्ट एड बॉक्स, अग्निशमन यंत्र है या नहीं इसकी चेकिंग की जाएगी। ऐसा नहीं पाया गया तो विद्यालय प्रबंधक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।