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चंदौलीः खुदाई में मिलीं उमा माहेश्वर की मूर्तियां, 11वीं - 12वीं शताब्दी में होता था इस तरह की मूर्तियों का निर्माण
Mon, 18 May 2020 08:14 PM IST
विचित्र सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: विचित्र सिंह
Updated Mon, 18 May 2020 08:14 PM IST
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खुदाई में मिली मूर्ति।
- फोटो : अमर उजाला।
चंदौली के सराय रसूलपुर चहनिया में एक खेत की खुदाई से उमा माहेश्वर की स्थानक मूर्तियां मिली हैं। जिसमें चतुर्भुज जटाजूट शिव और उनके बाई तरफ उमा का रूप प्रदर्शित हो रहा है। स्थानीय निवासी विनीत कुमार के मुताबिक जयप्रकाश यादव के खेत की खुदाई के दौरान मिली इन मूर्तियों की पहचान बीएचयू प्राचीन इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विनोद कुमार जायसवाल ने की है।
मूर्तियों के बारे में डॉ. विनोद ने बताया कि इस तरह की मूर्तियों का निर्माण 11वीं और 12वीं शताब्दी में होता था। मूर्ति में शिव के दाहिने हाथ में त्रिशूल, उसके नीचे नंदी और पाद के सन्निकट गणेश हैं, जबकि उमा के बाईं तरफ पाद के सन्निकट कार्तिकेय और शिव की जटा के समीप ऊपरी सिरे पर अक्षमाला है। एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। दाहिनी भुजा पर नाग लपेटा है।
बीएचयू दृश्य कला संकाय के प्रो. शांति स्वरूप सिन्हा के अनुसार मूर्ति को देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि शिव की जटा में जब गंगा आती हैं तो उमा द्वारा सौतड़ाह की वजह से रूठने पर मनाने के लिए हो सकता है। इसमे मानवीय स्वभाव के लोक परंपरा के समावेश का अंकन है।
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काशी परिक्षेत्र में 11वीं -12वीं शताब्दी में इस प्रकार की मूर्तियों का निर्माण होता था जिसकी प्राप्ति कंदवा के कर्दमेश्वर, शीतला मंदिर प्रह्लाद घाट, भैरवनाथ, कमच्छा और पंचक्रोशी मार्ग पर स्थित बभनियांव से भी हुई है।
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मूर्तियों के बारे में डॉ. विनोद ने बताया कि इस तरह की मूर्तियों का निर्माण 11वीं और 12वीं शताब्दी में होता था। मूर्ति में शिव के दाहिने हाथ में त्रिशूल, उसके नीचे नंदी और पाद के सन्निकट गणेश हैं, जबकि उमा के बाईं तरफ पाद के सन्निकट कार्तिकेय और शिव की जटा के समीप ऊपरी सिरे पर अक्षमाला है। एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। दाहिनी भुजा पर नाग लपेटा है।
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बीएचयू दृश्य कला संकाय के प्रो. शांति स्वरूप सिन्हा के अनुसार मूर्ति को देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि शिव की जटा में जब गंगा आती हैं तो उमा द्वारा सौतड़ाह की वजह से रूठने पर मनाने के लिए हो सकता है। इसमे मानवीय स्वभाव के लोक परंपरा के समावेश का अंकन है।
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काशी परिक्षेत्र में 11वीं -12वीं शताब्दी में इस प्रकार की मूर्तियों का निर्माण होता था जिसकी प्राप्ति कंदवा के कर्दमेश्वर, शीतला मंदिर प्रह्लाद घाट, भैरवनाथ, कमच्छा और पंचक्रोशी मार्ग पर स्थित बभनियांव से भी हुई है।