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कमल के खिलाफ ‘कमाल’ करने की कोशिश
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 03 Aug 2016 02:03 AM IST
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वाराण्ासी में सोनिया गांधी का रोड शो
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कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पं. कमलापति त्रिपाठी की कर्मभूमि से यूपी विधानसभा चुनाव के लिए रोड शो से बता दिया है कि वोटों के मामले में कंगाल हो चुकी कांग्रेस काशी से ‘कमाल’ करने की कवायद में जुट गई है। एक समय दिग्गज नेताओं में शुमार रहे पं. उमाशंकर दीक्षित की पुत्रवधू शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने के बाद कांग्रेस द्वारा कमल के गढ़ काशी को चुनने का संकेत यह भी है कि कांग्रेस का पूरा जोर कभी आधार वोट रहे ब्राह्मण, मुसलमान और दलितों का गठजोड़ बनाने और उन्हें नए सिरे अपने साथ जोड़ने पर है। मंगलवार के रोड शो का रूट कुछ इसी मंशा से बनाया गया था। यही नहीं, कांग्रेस के रणनीतिकार जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण काशी में कही गई बात लखनऊ और दिल्ली तक ही नहीं, पूरे देश में जाती है। ऐसे में काशी में रोड शो का मंतव्य समझना मुश्किल नहीं है।
कांग्रेस को पता है कि 27 साल पहले जब जनता ने उसे नकार दिया था, एनडी तिवारी प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद प्रदेश में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना, जबकि दलितों, ब्राह्मणों और आंशिक मुसलमानों की एकजुटता ने 2007 में बसपा को सत्ता की बागडोर सौंप दी थी। 2012 में ब्राह्मण और मुसलमान बसपा से छिटके और नतीजे ठीक उलटे गए। जानकार मानते हैं कि यूपी की विधानसभाओं में औसतन16 फीसदी ब्राह्मण मतदाता हैं। यदि ब्राह्मण कांग्रेस के साथ आ गए तो 15 से 18 प्रतिशत मुसलिम और करीब 20 फीसदी दलित मतदाताओं का एक वर्ग कांग्रेस से जुड़ सकता है।
वैसे पूर्वांचल का जो जातीय ताना-बाना है, उसमें सवर्णों में ब्राह्मणों से इतर तालमेल होते हैं। इसी उपेक्षा के कारण ब्राह्मणों का दलितों और मुसलमानों के स्वाभाविक गठजोड़ बनता रहा है। कांग्रेस की पूर्वांचल के उन ब्राह्मणों को अपने पाले में करने की कवायद है, जो अयोध्या आंदोलन के बाद से भाजपा के साथ पूरी निष्ठा से जुड़ गए। मुसलमानों पर कांग्रेस फिलहाल सीधा दांव लगाने से बच रही है, क्योंकि अंदेशा है कि जैसे की यह कोशिश की गई, दूसरी जातियों का भाजपा अपने पक्ष में गोलबंद कर लेगी। इसलिए वह चाहती है कि सबसे पहले ब्राह्मणों का विश्वास हासिल कर उनकी ‘घर वापसी’ की जाए।
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कांग्रेस को पता है कि 27 साल पहले जब जनता ने उसे नकार दिया था, एनडी तिवारी प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद प्रदेश में कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बना, जबकि दलितों, ब्राह्मणों और आंशिक मुसलमानों की एकजुटता ने 2007 में बसपा को सत्ता की बागडोर सौंप दी थी। 2012 में ब्राह्मण और मुसलमान बसपा से छिटके और नतीजे ठीक उलटे गए। जानकार मानते हैं कि यूपी की विधानसभाओं में औसतन16 फीसदी ब्राह्मण मतदाता हैं। यदि ब्राह्मण कांग्रेस के साथ आ गए तो 15 से 18 प्रतिशत मुसलिम और करीब 20 फीसदी दलित मतदाताओं का एक वर्ग कांग्रेस से जुड़ सकता है।
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वैसे पूर्वांचल का जो जातीय ताना-बाना है, उसमें सवर्णों में ब्राह्मणों से इतर तालमेल होते हैं। इसी उपेक्षा के कारण ब्राह्मणों का दलितों और मुसलमानों के स्वाभाविक गठजोड़ बनता रहा है। कांग्रेस की पूर्वांचल के उन ब्राह्मणों को अपने पाले में करने की कवायद है, जो अयोध्या आंदोलन के बाद से भाजपा के साथ पूरी निष्ठा से जुड़ गए। मुसलमानों पर कांग्रेस फिलहाल सीधा दांव लगाने से बच रही है, क्योंकि अंदेशा है कि जैसे की यह कोशिश की गई, दूसरी जातियों का भाजपा अपने पक्ष में गोलबंद कर लेगी। इसलिए वह चाहती है कि सबसे पहले ब्राह्मणों का विश्वास हासिल कर उनकी ‘घर वापसी’ की जाए।
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