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पुस्तक मेले में साहित्यिक पुस्तकों की धूम
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी
Updated Thu, 02 Apr 2015 02:00 AM IST
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वाराणसी। बीएचयू के राधाकृष्णन सभागार में बुधवार को शुरू हुई छह दिवसीय पुस्तक प्रदर्शनी में छात्र-छात्राओं की भीड़ उमड़ पड़ी। कहानी संग्रह और उपन्यासों के प्रति युवाओं की खास रुचि दिखी। राजकमल प्रकाशन की ओर से आयोजित प्रदर्शनी में दो हजार से अधिक पुस्तकें शामिल की गई हैं। समाज, इतिहास और राजनीति की पुस्तकों के साथ ही प्रख्यात रचनाकारों की उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियां छात्र-छात्राओं के आकर्षण का केंद्र बन गईं।
पुस्तक प्रदर्शनी का उद्घाटन कला संकाय प्रमुख प्रो. कुमार पंकज ने किया। प्रदर्शनी में ही आयोजित ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में नामचीन कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह और कवयित्री कात्यायनी विद्यार्थियों से रूबरू हुईं। अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपने उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ के बारे में चर्चा की। बताया कि बनारस के बुनकर समाज की वास्तविकता इस उपन्यास का धरातल है। यहां के बुनकरों के करघों की आवाज
धीरे-धीरे कबीर के अनहद नाद में तब्दील हो गई। मेरी रचना इसी अनहद नाद के मूल से उत्पन्न हुई है। कात्यायनी ने छात्र-छात्राओं के एक सवाल पर कहा कि मेरे लिए कविता न केवल आनंद और मोक्ष देने वाली है बल्कि प्रसव पीड़ा देने वाली विचारोत्तेजक उद्विग्नता भी है। उन्होेंने ‘पौरुषपूर्ण समय में’, ‘देह न होना’,
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‘सात भाइयाें की बीच चंपा’ और ‘गार्गी’ आदि कविताओं का पाठ किया। स्वागत प्रो. बलराज पांडेय ने किया। संचालन लक्ष्मण प्रसाद गुप्त और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी ने किया। इस मौके पर श्री प्रकाश शुक्ल, आशीष त्रिपाठी, नीरज खरे, प्रभाकर सिंह आदि मौजूद रहे।
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पुस्तक प्रदर्शनी का उद्घाटन कला संकाय प्रमुख प्रो. कुमार पंकज ने किया। प्रदर्शनी में ही आयोजित ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में नामचीन कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह और कवयित्री कात्यायनी विद्यार्थियों से रूबरू हुईं। अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपने उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ के बारे में चर्चा की। बताया कि बनारस के बुनकर समाज की वास्तविकता इस उपन्यास का धरातल है। यहां के बुनकरों के करघों की आवाज
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धीरे-धीरे कबीर के अनहद नाद में तब्दील हो गई। मेरी रचना इसी अनहद नाद के मूल से उत्पन्न हुई है। कात्यायनी ने छात्र-छात्राओं के एक सवाल पर कहा कि मेरे लिए कविता न केवल आनंद और मोक्ष देने वाली है बल्कि प्रसव पीड़ा देने वाली विचारोत्तेजक उद्विग्नता भी है। उन्होेंने ‘पौरुषपूर्ण समय में’, ‘देह न होना’,
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‘सात भाइयाें की बीच चंपा’ और ‘गार्गी’ आदि कविताओं का पाठ किया। स्वागत प्रो. बलराज पांडेय ने किया। संचालन लक्ष्मण प्रसाद गुप्त और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी ने किया। इस मौके पर श्री प्रकाश शुक्ल, आशीष त्रिपाठी, नीरज खरे, प्रभाकर सिंह आदि मौजूद रहे।