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संकट मोचन संगीत समारोह: राम मिलन की आस में गंधर्वजेता के दरबार में हाजिरी, पांच शताब्दी से चली आ रही रीत

Sun, 09 Apr 2023 11:52 AM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Sun, 09 Apr 2023 11:52 AM IST
सार

संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र ने बताया कि कहते हैं कि आज जो संकटमोचन संगीत समारोह का स्वरूप आप देख रहे हैं, यह पिछले 100 वर्षों का व्यवस्थित रूप है। अध्ययन करें तो पता चलता है कि आयोजन की आधारशिला गोस्वामी तुलसीदास ने रखी थी। वेद, पुराणों के साथ ही संगीत और मल्लविद्या के भी मर्मज्ञ थे।

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Sankat Mochan Music Festival: Attendance in the court of Gandharvajeta in the hope of meeting Ram
संकट मोचन संगीत समारोह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ज्ञानगुण गंधर्वजेता यानी संगीत में गंधर्वों को भी पछाड़ने वाले हनुमत लला के दरबार में सात रागिनियां जब आकार लेती हैं तो भक्ति का रस कण-कण में बिखर जाता है। कहने को तो संकटमोचन संगीत समारोह का यह शताब्दी वर्ष है, लेकिन इसकी शुरुआत की बात करें तो गोस्वामी तुलसीदास आयोजन के आधार स्तंभ हैं, ऐसे में संगीत का यह अनूठा आयोजन 500 साल से भी अधिक पुराना है।

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संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र ने बताया कि कहते हैं कि आज जो संकटमोचन संगीत समारोह का स्वरूप आप देख रहे हैं, यह पिछले 100 वर्षों का व्यवस्थित रूप है। अध्ययन करें तो पता चलता है कि आयोजन की आधारशिला गोस्वामी तुलसीदास ने रखी थी। वेद, पुराणों के साथ ही संगीत और मल्लविद्या के भी मर्मज्ञ थे। विनय पत्रिका में जितने भी पद हैं उसमें रागिनियों का वर्णन है। कौन सा पद कौन सा राग किस काल में गाया जाता है, इसका भी उल्लेख मिलता है। हमारे यहां राग और भोग से भगवान की सेवा का विधान है। भगवान को शाम को संगीत का श्रवण कराया जाता है। उस दौर में आयोजन इतने व्यवस्थित नहीं थे और प्रचार-प्रसार के साधन भी नहीं थे। गोस्वामी जी ने ही अपने ईष्ट के लिए इस संगीत यात्रा की शुरुआत की। उन्होंने हनुमान चालीसा में भी लिखा है कि बिना हनुमान जी को प्रसन्न किए राम तक नहीं पहुंचा जा सकता है। तो यहां आने वाला हर साधक राम तक जाने के लिए हनुमान को प्रसन्न करने के लिए कला की श्रद्धा अर्पित करता है।

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Sankat Mochan Music Festival: Attendance in the court of Gandharvajeta in the hope of meeting Ram
संकट मोचन संगीत समारोह - फोटो : अमर उजाला

मंदिर की ड्योढ़ी से हुई थी शुरुआत

प्रो. मिश्र ने बताया कि संगीत महोत्सव का पहला आयोजन 1923 में हुआ था। पहला मंच मंदिर की ड्योढ़ी थी जहां से कलाकारों ने हनुमान जी से राम मिलन की गुहार लगाई थी। गर्भगृह के बाहर बैठकर कलाकार गायन-वादन की प्रस्तुतियां देते थे। पं. अमरनाथ मिश्र संगीत समारोह की पूरी जिम्मेदारी निभाते थे। 25 साल तक संगीत का यह आयोजन एक दिन का ही थी।

जब तबले की थाप से टूट गई ट्यूबलाइट

संगीत समारोह में जब भीड़ बढ़ने लगी तो बड़े महंत पं. बांकेराम मिश्र ने कुएं की जगत को मंच बनवा दिया। कलाकार कुएं की जगत पर बैठकर हनुमान जी को संगीत सुनाने लगे। कलाकारों की संख्या और आयोजन की प्रसिद्धि बढ़ने लगी तो स्थानीय के बाद बाहरी कलाकारों का प्रवेश शुरू हुआ। 40वें साल में आयोजन स्थल गर्भगृह के दक्षिणी छोर के बरामदे में हो गया। आयोजन दो दिन का होने लगा। 66 के दशक में बाहर से आने वाले पं. सियाराम तिवारी बड़े कलाकार थे। 71 और 72 में पं. जसराज के बड़े भाई पं. मणिराम वहीं, दूसरे आयोजन में दिल्ली के वायलिन वादक विजी जोग और पं. राजन मिश्र के चाचा पं. गोपाल मिश्र ने सारंगी पर जुगलबंदी की। तबले पर थे पं. किशन महाराज। दर्शकों का कहना था कि पं. किशन महाराज ने तबले पर ऐसी थाप दी कि ट्यूबलाइट ही टूट गई। इसको लेकर चर्चाएं भी खूब हुईं। समापन तबला वादक पं. कंठे की अंतिम प्रस्तुति से होती थी। ख्याति और कलाकारों की बढ़ती संख्या को देख मंच के साथ ही आयोजन भी तीन दिवसीय हो गया।

 

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संकट मोचन संगीत समारोह - फोटो : अमर उजाला

चौथी बार बदल गया मंच

1971 में संगीत समारोह का चौथा मंच गर्भगृह के उत्तर दिशा के आंगन के पश्चिमी बरामदे को बनाया गया। तब से आयोजन स्थल वहीं है। आयोजन भी तीन दिवसीय हो गया। 77-78 के दशक में चार दिन का आयोजन हुआ। इसके बाद पांच दिन का कार्यक्रम होने लगा। प्रो. मिश्र ने बताया कि बड़े महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र के समय तक आयोजन पांच दिन का ही होता था, लेकिन कलाकारों की संख्या बढ़ने लगी तो 2014 से इसे छह दिन का कर दिया गया। शताब्दी वर्ष में इसे सात दिन का किया गया है, यह केवल इसी बार रहेगा।

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