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बीएचयू में शोध: चांदीपुरा वायरस से मस्तिष्क संबंधी बीमारियों का ज्यादा खतरा, दवा और टीका बनने की जगी उम्मीद

Sun, 21 Nov 2021 07:58 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Sun, 21 Nov 2021 07:58 PM IST
सार

चांदीपुरा वायरस के कारणों का पता लगाने में बीएचयू के वैज्ञानिकों की टीम ने शोध किया है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल्स जनरल ऑफ बायोमेडिकल साइंस में हाल ही में प्रकाशित भी हो चुका है। 

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Research in BHU Chandipura virus increases risk of neurological diseases hopes of becoming medicine and vaccine
वायरस - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

महाराष्ट्र में बच्चों में होने वाली बीमारी चांदीपुरा वायरस के कारणों का पता लगाने में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वैज्ञानिकों की टीम को सफलता मिली है। मॉलिक्यूलर बायोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुनीत कुमार सिंह के निर्देशन में हुए शोध में पता चला है कि वायरस से मस्तिष्क संबंधी बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है।

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बीमारी के कारणों का पता लगने के बाद ही इससे बचाव के लिए दवा बनाने और वैक्सीन बनाने में आसानी होगी। यह शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल्स जनरल ऑफ बायोमेडिकल साइंस में हाल ही में प्रकाशित भी हो चुका है। मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के प्रो. सुनीत सिंह के अनुसार, चांदीपुरा वायरस के प्रभाव से मस्तिष्क में सूजन होने लगती है जो कि आगे चलकर घातक हो जाती है।
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चांदीपुरा वायरस के लक्षण
मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं होती हैं। मस्तिष्क में संक्रमण होने पर इन कोशिकाओं में इन्फ्लैमेशन की वजह से सूजन हो जाती है और इनके कार्य प्रणाली में भी बदलाव देखने को मिलता है। चांदीपुरा वायरस के संक्रमण से तीव्र बुखार, उल्टी, ऐंठन एवं अन्य मस्तिष्क की विकृतियों जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं जिसके कारण मरीजों में इन्सेफेलाइटिस जैसे लक्षण प्रकट होना शुरू हो जाते हैं।
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1966 में मिला था पहला मामला

Research in BHU Chandipura virus increases risk of neurological diseases hopes of becoming medicine and vaccine
प्रो.सुनीत कुमार सिंह - फोटो : अमर उजाला
गंभीर रूप से प्रभावित मरीज कोमा में भी चले जाते हैं और कुछ की मृत्यु भी हो जाती है। इन लक्षणों को एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) की श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता हैं। एईएस के ज्यादातर मामलों में बैक्टीरियल मैनिंजाइटिस या जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस (जेईवी) के संक्रमण को कारण माना जाता है।

बताया कि 1966 में महाराष्ट्र के नागपुर के पास चांदीपुर गांव में चांदीपुरा वायरस की खोज हुई थी। इसके बाद 2002-2004 में आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र एवं गुजरात में रिपोर्ट किया गया था।

15 साल से कम उम्र के बच्चों को खतरा अधिक, अब तक कोई दवा नहीं

प्रो.सुनीत ने बताया कि चांदीपुरा वायरस एक आरएनए वायरस है। 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे इस संक्रमण की जद में अधिक आते हैं और उनमें मृत्यु दर की संभावना भी अधिक होती है। चांदीपुरा वायरस, संक्रमित सैंडफ्लाइज और मच्छरों से फैलता है।

इसके उपचार के लिए कोई विशिष्ट एंटी वायरल दवा नहीं हैं। यह समय की आवश्यकता है कि इस प्रकार के नेग्लेक्टेड वायरस पर शोध कार्य हो, जिससे उसकी रोगजनक प्रक्रियाओं को सही रूप से समझा सा सके और वह आने वाले समय में डाइग्नोसिस एवं औषधि निर्माण में सहायक हो सके।
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