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त्याग और साधना ही है सनातन धर्म संस्कृति का सूत्र : रामानुजाचार्य
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में रविवार को स्वामी हरिहरानंद सरस्वती करपात्री स्वामी स्मृति पुरस्कार संत जगदगुरु रामानुजाचार्य वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर महाराज को दिया गया। वहीं, पं. शंभूनाथ मिश्र स्मृति सम्मान पं. गणेश्वर शास्त्री द्राविण को दिया गया।
रविवार को पाणिनी भवन सभागार में हुए समारोह के मुख्य अतिथि अयोध्या के कौशलेश सदनपीठाधीश्वर जगदगुरु रामानुजाचार्य राघवाचार्य महाराज ने कहा कि यह प्रांगण और यहां के पूज्य आचार्यों ने राष्ट्र निर्माण एवं सनातन धर्म संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव त्याग किया है। यही साधना ही सनातन धर्म संस्कृति का सूत्र है। स्वामी करपात्री जी महाराज भी इसी त्याग और तप के देव थे। धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज ने आजीवन सनातन धर्म संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहे। उन्होंने शंकराचार्य पद को स्वीकार नहीं किया। क्योंकि धर्म की रक्षा में राजनीति का हस्तक्षेप अवश्य होता है।
स्वामी हरिहरानंद पुरस्कार से सम्मानित श्रीधाम अयोध्यापीठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानुजाचार्य वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर महाराज ने कहा कि यह धनात्मक ऊर्जा का प्रांगण है। जब तक मां सरस्वती का भाव न होगा भक्तिभाव न होगा। काशी विद्वत परिषद के उपाध्यक्ष पं. गणेश्वर शास्त्री द्राविण ने कहा कि गुरु के स्मरण मात्र से ही समूल पाप का क्षय होता है। कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने कहा कि यह परिसर ऋषि-मुनियों और आचार्यों का परिसर है। साधकों के सम्मान से आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दौरान डॉ. कुंज बहादुर द्विवेदी, डॉ. ज्ञानेंद्र सापकोटा, शंभूनाथ मिश्र, प्रो. रामपूजन पांडेय, प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. कमलाकांत त्रिपाठी, प्रो. अमित शुक्ल, डॉ. विजय पांडेय, डॉ. सत्येंद्र यादव मौजूद रहे।
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रविवार को पाणिनी भवन सभागार में हुए समारोह के मुख्य अतिथि अयोध्या के कौशलेश सदनपीठाधीश्वर जगदगुरु रामानुजाचार्य राघवाचार्य महाराज ने कहा कि यह प्रांगण और यहां के पूज्य आचार्यों ने राष्ट्र निर्माण एवं सनातन धर्म संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव त्याग किया है। यही साधना ही सनातन धर्म संस्कृति का सूत्र है। स्वामी करपात्री जी महाराज भी इसी त्याग और तप के देव थे। धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज ने आजीवन सनातन धर्म संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहे। उन्होंने शंकराचार्य पद को स्वीकार नहीं किया। क्योंकि धर्म की रक्षा में राजनीति का हस्तक्षेप अवश्य होता है।
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स्वामी हरिहरानंद पुरस्कार से सम्मानित श्रीधाम अयोध्यापीठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानुजाचार्य वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर महाराज ने कहा कि यह धनात्मक ऊर्जा का प्रांगण है। जब तक मां सरस्वती का भाव न होगा भक्तिभाव न होगा। काशी विद्वत परिषद के उपाध्यक्ष पं. गणेश्वर शास्त्री द्राविण ने कहा कि गुरु के स्मरण मात्र से ही समूल पाप का क्षय होता है। कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने कहा कि यह परिसर ऋषि-मुनियों और आचार्यों का परिसर है। साधकों के सम्मान से आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दौरान डॉ. कुंज बहादुर द्विवेदी, डॉ. ज्ञानेंद्र सापकोटा, शंभूनाथ मिश्र, प्रो. रामपूजन पांडेय, प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. कमलाकांत त्रिपाठी, प्रो. अमित शुक्ल, डॉ. विजय पांडेय, डॉ. सत्येंद्र यादव मौजूद रहे।
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