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दुर्लभ जानकारी: बिना गुदना वाली लड़कियों के हाथ का खाना भी नहीं खाते थे लोग, BHU के शोध में सामने आए रोचक तथ्य

Fri, 31 May 2024 10:02 AM IST
अमन विश्वकर्मा पंकज चौबे, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
पंकज चौबे, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Fri, 31 May 2024 10:02 AM IST
सार

Varanasi News: महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग गुदना होता था। महिलाओं में शादी से पूर्व गुदने की डिजाइन अलग और शादी के बाद की डिजाइन अलग होती थी। जिस लड़की के हाथ में गुदना नहीं होता था, उसकी शादी नहीं होती थी। अगर किसी लड़की की शादी हो भी गई तो ससुराल वाले उसके हाथ का भोजन और पानी स्वीकार नहीं करते थे। एक तरह से उसे बहिष्कृत कर दिया जाता था।

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Rare information in BHU research People did not eat food cooked by girls without tattoos
महिला के हाथ पर गुदना। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जो लड़की गुदना (टैटू) का दर्द नहीं सह सकती, वह विवाह के बाद प्रसव पीड़ा कैसे सह पाएगी। गुदना लड़की के लिए गृहस्थ जीवन में प्रवेश से पूर्व बेहद महत्वपूर्ण पारंपरिक दहलीज थी। इसे विवाह योग्य प्रत्येक लड़की को पार करना जरूरी था। यही वजह है कि प्राचीन काल में बिना गुदना गुदवाए लड़की की शादी नहीं होती थी।

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यह खुलासा बीएचयू के एक शोध में हुआ है। बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की टीम ने गुदना गुदवाने की लोक परंपरा का वैज्ञानिक अध्ययन किया है। 
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इसके लिए सोनभद्र, मिर्जापुर समेत पूर्वांचल के विभिन्न जिलों और बिहार के सासाराम की आदिवासी महिलाओं के बीच से गुदना संस्कृति से जुड़े दुर्लभ तथ्य जुटाए गए हैं। इससे पता चला है कि गुदना प्राचीन भारतीय समाज की सामाजिक और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता था। 
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अध्ययन के सिलसिले में सोनभद्र जिले के पंचमुखी क्षेत्र के पांच किलोमीटर दायरे और सासाराम में ताराचंडी मंदिर के आसपास के आदिवासी इलाके में सर्वे कर चुकीं बीएचयू की शोधार्थी प्रीति रावत बताती हैं कि तकरीबन 2000 वर्ष पुरानी सभ्यता की गवाही देने वाले शैलचित्रों में बनीं आकृतियां गुदना के डिजाइन में भी दिखती हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गुदना गुदवाने की परंपरा दो से ढाई हजार वर्ष या उससे भी पुरानी रही होगी।

जहरीले जीव-जंतुओं की आकृति बनाकर पुरुष उन्हें देते थे सम्मान

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 सदियों पुराना है गुदना का प्रचलन। - फोटो : अमर उजाला

प्राचीन संस्कृति में पुरुष भी गुदना गुदवाते थे। अध्ययन में मिले साक्ष्यों से पता चला है कि खरवार जनजाति के पुरुष हाथों पर बिच्छू या सर्प आदि विषैले जीव जंतुओं की आकृति बनवाते थे। इसके पीछे मान्यता थी कि वे विषैले जंतुओं को सम्मान दे रहे हैं, जिससे वे उन पर अब हमला नहीं करेंगे। इसी तरह ओरांव जनजाति की महिलाओं के माथे के बीचोबीच तीन धारियां और कुछ बिंदियों वाला गुदना मिलता है। जो उन महिलाओं के योद्धा होने का प्रमाण देता है। ऐसी महिलाओं को ‘दई’ कहा जाता था।

विकास के साथ संस्कृति का हुआ आदान-प्रदान
प्रीति रावत बताती हैं कि समय के साथ गुदना संस्कृति का एक्सचेंज हुआ। सासाराम में ताराचंडी मंदिर के आसपास के इलाके में सर्वे के दौरान गोंड कम्यूनिटी की औरतों के हाथ में एक जैसा गुदना दिखा। फिर वैश्य समुदाय की औरतों के हाथ में भी वैसा ही जालीनुमा आकृति वाला गुदना दिखा।

क्या कहते हैं जानकार
प्राचीन भारतीय समाज में गुदना का खास महत्व रहा है। संतानोत्पत्ति से लेकर मृत्यु तक लोक परंपरा में गुदना की मान्यता रही है। उस समय महिला-पुरुष दोनों के शरीर पर मोटे और बड़े गुदना गुदवाने के साक्ष्य मिलते हैं। - डॉ. सचिन कुमार तिवारी, पुरातत्वविद्, बीएचयू

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