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हनुमान जी ने जला दी सोने की लंका, चूर-चूर हुआ रावण का अहंकार
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ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा, जरा न सो तेहि कारन गिरिजा। उलटि पलटि लंका सब जारी, कूदि परा पुनि सिंधु मझारी। अर्थात शिवजी कहते हैं, हे पार्वती! जिन्होंने अग्नि को बनाया, हनुमानजी उन्हीं के दूत हैं। इसी कारण वे अग्नि से नहीं जले। हनुमानजी ने उलट-पलटकर एक ओर से दूसरी ओर तक सारी लंका जला दी। फि र वे समुद्र में कूद पड़े। शुक्रवार को श्री चित्रकूट रामलीला और गोस्वामी तुलसीदास की रामलीला में लंकादहन का मंचन किया गया।
शुक्रवार को रामलीला के दौरान हनुमानजी प्रणाम कर मैनाक पर्वत पर उतरते हैं। उन्हें विश्राम देने के लिए मैनाक धंस जाता है। आगे बढ़ने पर सुरसा हनुमानजी का रास्ता रोक लेती है। अनुनय विनय के बाद भी बात न बनने पर सुरसा के मुख का फैलाव बत्तीस योजन होते ही सूक्ष्म रूप धर प्रवेश कर, बाहर आ जाते हैं। सुरसा उनकी बुद्धि की प्रशंसा करने के साथ ही रामकाज पूर्ण करने का आशीर्वाद देती है। मच्छर रूप धारण कर लंका में प्रवेश करते ही सुरक्षा में तैनात लंकिनी उनका रास्ता रोकती है। उनके घूंसे के एक वार से ही लंकिनी मुख से खून उगल देती है। ब्रह्मा जी की भविष्यवाणी का हवाला देते हुए कहती है कि लंका का सर्वनाश अब नजदीक है। कुटिया से राम-राम की आवाज सुन हनुमान अंदर जाते हैं और सामने विभीषण को पाते हैं। ब्राह्मण वेष हनुमान का परिचय पाते ही विभीषण प्रणाम करते हैं और माता सीता का पता बताते हैं। अशोक वाटिका पहुंचे हनुमान सीता पर रावण द्वारा किए जा रहे अत्याचार से व्यथित हो जाते हैं।
सीता का दुख देख प्रभु श्रीराम से निशानी के तौर पर मिली अंगुठी गिराते हैं। रामदूत के रूप में अपना परिचय देते हैं और प्रभु श्रीराम के वियोग में व्याकुल होने का समाचार सुना कर ढांढस बंधाते हैं। साथ ही उनसे आज्ञा लेकर फ ल खाते हैं और बाग को भी क्षति पहुंचाते हैं। रोकने पर अक्षय कुमार समेत राक्षसों को मार गिराते हैं। अंत में मेघनाद उन्हें बंदी बनाकर रावण के सामने ले जाता है और हनुमान उसे प्रभु की महिमा सुनाते हैं। लंका दहन के बाद हनुमान वानर सेना के बीच आते हैं और सभी नाचते-गाते, फ ल खाते प्रभु श्रीराम के पास जाते हैं। सुग्रीव गले लगाकर हनुमान की प्रशंसा करते हैं। अयोध्या भवन में पं. मुकुंद उपाध्याय ने और संकटमोचन मंदिर में महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने स्वरूपों की आरती उतारी।
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शुक्रवार को रामलीला के दौरान हनुमानजी प्रणाम कर मैनाक पर्वत पर उतरते हैं। उन्हें विश्राम देने के लिए मैनाक धंस जाता है। आगे बढ़ने पर सुरसा हनुमानजी का रास्ता रोक लेती है। अनुनय विनय के बाद भी बात न बनने पर सुरसा के मुख का फैलाव बत्तीस योजन होते ही सूक्ष्म रूप धर प्रवेश कर, बाहर आ जाते हैं। सुरसा उनकी बुद्धि की प्रशंसा करने के साथ ही रामकाज पूर्ण करने का आशीर्वाद देती है। मच्छर रूप धारण कर लंका में प्रवेश करते ही सुरक्षा में तैनात लंकिनी उनका रास्ता रोकती है। उनके घूंसे के एक वार से ही लंकिनी मुख से खून उगल देती है। ब्रह्मा जी की भविष्यवाणी का हवाला देते हुए कहती है कि लंका का सर्वनाश अब नजदीक है। कुटिया से राम-राम की आवाज सुन हनुमान अंदर जाते हैं और सामने विभीषण को पाते हैं। ब्राह्मण वेष हनुमान का परिचय पाते ही विभीषण प्रणाम करते हैं और माता सीता का पता बताते हैं। अशोक वाटिका पहुंचे हनुमान सीता पर रावण द्वारा किए जा रहे अत्याचार से व्यथित हो जाते हैं।
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सीता का दुख देख प्रभु श्रीराम से निशानी के तौर पर मिली अंगुठी गिराते हैं। रामदूत के रूप में अपना परिचय देते हैं और प्रभु श्रीराम के वियोग में व्याकुल होने का समाचार सुना कर ढांढस बंधाते हैं। साथ ही उनसे आज्ञा लेकर फ ल खाते हैं और बाग को भी क्षति पहुंचाते हैं। रोकने पर अक्षय कुमार समेत राक्षसों को मार गिराते हैं। अंत में मेघनाद उन्हें बंदी बनाकर रावण के सामने ले जाता है और हनुमान उसे प्रभु की महिमा सुनाते हैं। लंका दहन के बाद हनुमान वानर सेना के बीच आते हैं और सभी नाचते-गाते, फ ल खाते प्रभु श्रीराम के पास जाते हैं। सुग्रीव गले लगाकर हनुमान की प्रशंसा करते हैं। अयोध्या भवन में पं. मुकुंद उपाध्याय ने और संकटमोचन मंदिर में महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने स्वरूपों की आरती उतारी।
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