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अब चावल की ‘सुगंध’ से महक उठेगा पूर्वांचल
amarujala.com, written by प्रदीप मिश्र
Updated Tue, 18 Jul 2017 02:55 PM IST
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नई प्रजातियों के विकास के साथ किसानों की समृद्धि के खुल सकते हैं द्वार
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‘धान के कटोरे’ में चावल उत्पादन के उफान आने की संभावना है। सूबे में तराई के बाद पूर्वांचल और इसमें खासकर चंदौली, मिर्जापुर और सोनभद्र जिलों में सबसे अधिक पैदावार होती है। मगर सुगंध, आकार, स्वाद और प्रति हेक्टेअर उत्पादन क्षमता को लेकर कुछ पीछे रह जाता है।
इसीलिए किसानों को न तो यहां ही बेहतर दाम मिल पाता है न ही देश की अन्य मंडियों में जा पाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वाराणसी को अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान दिए जाने से धान की नई प्रजातियों के विकास के साथ किसानों की समृद्धि के सभी द्वारा खुल सकते हैं।
यहां से दूसरी हरित क्रांति की शुरूआत संभव है लेकिन फसलों की जरूरत को लेकर जागरूकता की कमी के कारण किसान नए प्रयोग करने से डरते हैं। नतीजतन, दक्षिण भारत के मुकाबले औसत उत्पादकता यहां काफी कम है।
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यही नहीं, तमाम शोध अभी कृषि विज्ञानियों की प्रयोगशाला से निकल कर जमीन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। वाराणसी, आजमगढ़ और गाजीपुर में कृषि विज्ञान केंद्रों की संख्या बढ़ाकर दो-दो करने के बाद इसमें तेजी आने की उम्मीद है।... और उस पर काशी में चावल अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थान इसमें चार चांद लगा सकता है।
काशी में चावल अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थान खोलने को प्रधानमंत्री के 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए किए जा रहे उपायों के तौर पर भी देखा जा रहा है।
बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित सात जिलों में किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता जांचने के साथ-साथ किसानों को खाद और उच्च प्रजातियों के बीज दिलाने के साथ उनकी उपज के विपणन व्यवस्था पर काम शुरू हो गया है।
चावल के जरिए पूर्वांचल में धान की नई प्रजातियों का विकास किया जाएगा। धान की उत्पादकता को बढ़ाया जाएगा। इस दिशा में पहले से ही काम कर रहे काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कृषि विज्ञान संस्थान इसमें मददगार होगा।
राष्ट्रीय बीज अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र इस क्षेत्र में किए जाने वाले शोध को प्रशिक्षण और प्रदर्शन के माध्यम से किसानों के खेतों तक पहुंचाएगा। कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि पूर्वांचल की भूमि में उत्पादक क्षमता सर्वाधिक है। श्रम भी उपलब्ध है तो यह यहां की अर्थव्यवस्था को खासा प्रभावित कर सकता है।
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इसीलिए किसानों को न तो यहां ही बेहतर दाम मिल पाता है न ही देश की अन्य मंडियों में जा पाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वाराणसी को अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान दिए जाने से धान की नई प्रजातियों के विकास के साथ किसानों की समृद्धि के सभी द्वारा खुल सकते हैं।
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यहां से दूसरी हरित क्रांति की शुरूआत संभव है लेकिन फसलों की जरूरत को लेकर जागरूकता की कमी के कारण किसान नए प्रयोग करने से डरते हैं। नतीजतन, दक्षिण भारत के मुकाबले औसत उत्पादकता यहां काफी कम है।
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यही नहीं, तमाम शोध अभी कृषि विज्ञानियों की प्रयोगशाला से निकल कर जमीन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। वाराणसी, आजमगढ़ और गाजीपुर में कृषि विज्ञान केंद्रों की संख्या बढ़ाकर दो-दो करने के बाद इसमें तेजी आने की उम्मीद है।... और उस पर काशी में चावल अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थान इसमें चार चांद लगा सकता है।
काशी में चावल अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थान खोलने को प्रधानमंत्री के 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए किए जा रहे उपायों के तौर पर भी देखा जा रहा है।
बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित सात जिलों में किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता जांचने के साथ-साथ किसानों को खाद और उच्च प्रजातियों के बीज दिलाने के साथ उनकी उपज के विपणन व्यवस्था पर काम शुरू हो गया है।
चावल के जरिए पूर्वांचल में धान की नई प्रजातियों का विकास किया जाएगा। धान की उत्पादकता को बढ़ाया जाएगा। इस दिशा में पहले से ही काम कर रहे काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कृषि विज्ञान संस्थान इसमें मददगार होगा।
राष्ट्रीय बीज अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र इस क्षेत्र में किए जाने वाले शोध को प्रशिक्षण और प्रदर्शन के माध्यम से किसानों के खेतों तक पहुंचाएगा। कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि पूर्वांचल की भूमि में उत्पादक क्षमता सर्वाधिक है। श्रम भी उपलब्ध है तो यह यहां की अर्थव्यवस्था को खासा प्रभावित कर सकता है।