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बाकला खाएं, कांपने की बीमारी भगाएं
ब्यूरो/ अमर उजाला, वाराण्ासी
Updated Mon, 11 Apr 2016 01:37 AM IST
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बाकले का दाना
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बाकला दाल के नियमित सेवन से कांपने की बीमारी (पार्किंसन) को दूर भगाया जा सकता है। बीएचयू के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रो. विजय नाथ मिश्र ने दस मरीजों पर शोध के बाद यह दावा किया है। उनका कहना है बाकला दाल में लिवोडोपा के तत्व पाए जाते हैं। लिवोडोपा नामक दवाई पार्किंसन के मरीजों को दी जाती है। ऐसे में यदि इसका नियमित सेवन किया जाए तो बीमारी पूरी तरह से ठीक हो सकती है।
प्रो. मिश्र ने बताया कि पार्किंसन की बीमारी में मरीज के हाथ-पैर या शरीर का कोई दूसरा हिस्सा कांपने लगता है और धीरे-धीरे वह शिथिल हो जाता है। ज्यादातर 50 वर्ष की उम्र पार कर चुके लोग इस बीमारी के शिकार होते हैं। इस बीमारी को आनुवंशिक भी बताया जाता है। अमूमन इसके मरीजों को चिकित्सक लिवोडोपा दवा लेने की सलाह देते हैं।
प्रो. मिश्र ने बताया कि एक साल में यूपी, बिहार समेत अन्य राज्यों से करीब पांच सौ से ज्यादा पार्किंसन के मरीज इलाज के लिए आते हैं। बताया कि दस मरीजों को बाकला दाल खाने की सलाह दी गई। तीन महीने बाद ही इसका असर देखने को मिला। इन मरीजों की दवा धीरे-धीरे कम कर दी गई। उन्होंने बताया कि कुछ महीनों बाद उनकी दवा बंद कर दी जाएगी।
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यह है पार्किंसन बीमारी
इस बीमारी में शरीर के किसी एक हिस्से में कंपन शुरू होता है। अमूमन यह हाथ, पैर या गर्दन से शुरू होती है। धीरे-धीरे मसल्स कमजोर होने लगते हैं, जिससे पूरे शरीर में शिथिलता आ जाती है। मरीज चलने-फिरने में कमजोरी महसूस करता है।
यूपी, बिहार, एमपी और असम में मिलती है बाकला
बाकला की पैदावार उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और असम समेत देश के विभिन्न हिस्सों में होती है। गांवों में बाकला को मसलहिया सेम भी कहा जाता है। बाजार में इसकी दाल आसानी से मिल जाती है। बहुत से लोग इसकी सब्जी और हलुआ भी बनाते हैं।
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प्रो. मिश्र ने बताया कि पार्किंसन की बीमारी में मरीज के हाथ-पैर या शरीर का कोई दूसरा हिस्सा कांपने लगता है और धीरे-धीरे वह शिथिल हो जाता है। ज्यादातर 50 वर्ष की उम्र पार कर चुके लोग इस बीमारी के शिकार होते हैं। इस बीमारी को आनुवंशिक भी बताया जाता है। अमूमन इसके मरीजों को चिकित्सक लिवोडोपा दवा लेने की सलाह देते हैं।
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प्रो. मिश्र ने बताया कि एक साल में यूपी, बिहार समेत अन्य राज्यों से करीब पांच सौ से ज्यादा पार्किंसन के मरीज इलाज के लिए आते हैं। बताया कि दस मरीजों को बाकला दाल खाने की सलाह दी गई। तीन महीने बाद ही इसका असर देखने को मिला। इन मरीजों की दवा धीरे-धीरे कम कर दी गई। उन्होंने बताया कि कुछ महीनों बाद उनकी दवा बंद कर दी जाएगी।
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यह है पार्किंसन बीमारी
इस बीमारी में शरीर के किसी एक हिस्से में कंपन शुरू होता है। अमूमन यह हाथ, पैर या गर्दन से शुरू होती है। धीरे-धीरे मसल्स कमजोर होने लगते हैं, जिससे पूरे शरीर में शिथिलता आ जाती है। मरीज चलने-फिरने में कमजोरी महसूस करता है।
यूपी, बिहार, एमपी और असम में मिलती है बाकला
बाकला की पैदावार उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और असम समेत देश के विभिन्न हिस्सों में होती है। गांवों में बाकला को मसलहिया सेम भी कहा जाता है। बाजार में इसकी दाल आसानी से मिल जाती है। बहुत से लोग इसकी सब्जी और हलुआ भी बनाते हैं।