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पय पयोधि तजि अवध बिहाई, जहं सिय लखनु रामु रहे आई...
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पय पयोधि तजि अवध बिहाई, जहं सिय लखनु रामु रहे आई। कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन, जौं सत सहस होहिं सहसानन॥ क्षीर सागर को त्यागकर और अयोध्या को छोड़कर जहां सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचंद्रजी आकर रहे, उस वन की जैसी परम शोभा, उसको हजार मुख वाले लाख शेषजी भी नहीं कह सकते हैं। भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या को छोड़कर चित्रकूट में निवास कर रहे हैं।
रविवार को लोहटिया स्थित अयोध्या भवन में चित्रकूट रामलीला में श्री राम घरनैल, भारद्वाज आश्रम में आतिथ्य, पथिक और चित्रकूट में निवास की झांकी सजाई गई। रघुबर कहेउ लखन भल घाटू, करहु कतहुं अब ठाहर ठाटू। लखन दीख पय उतर करारा, चहुं दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥ भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि घाट बहुत अच्छा है। अब यहीं कहीं पर ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मण जी ने पयस्विनी नदी के उत्तर के ऊंचे किनारे को देखा और कहते हैं कि इसके चारों ओर धनुष के जैसा एक नाला फिरा हुआ है।
लक्ष्मणजी जी भगवान राम को मंदाकिनी के स्थान को दिखाते हैं और भगवान राम उसको देखकर प्रसन्न होते हैं। जब देवताओं को आभास हो गया कि भगवान राम का मन यहां पर रम गया है तो वह विश्वकर्मा को साथ लेकर पहुंचे। कोल-भीलों के वेष में आए देवताओं ने पत्तों और घास से सुंदर घर का निर्माण किया। लक्ष्मणजी, जानकीजी सहित प्रभु श्रीरामचंद्र घास-पत्तों के घर में शोभायमान हो रहे हैं। देवता आसमान से फूलों की बरसात करते हैं। देवता भगवान राम से कहते हैं कि हे नाथ आज हम सनाथ हो गए। चित्रकूट में भगवान राम के निवास करते ही वन की शोभा और बढ़ जाती है। सभी चित्रकूट और मंदाकिनी के भाग्य की सराहना करते हुए नहीं थकते हैं।
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धनुषभंग के साथ शुरू हुई तुलसीघाट की रामलीला
तुलसीघाट पर धनुषभंग के साथ ही रामलीला आरंभ हो गई। रविंद्रपुरी में जनक पुरी का दृश्य सजाया गया। भगवान राम ने जैसे ही शिव धनुष को भंग किया सीता ने उनका वरण किया।
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रविवार को लोहटिया स्थित अयोध्या भवन में चित्रकूट रामलीला में श्री राम घरनैल, भारद्वाज आश्रम में आतिथ्य, पथिक और चित्रकूट में निवास की झांकी सजाई गई। रघुबर कहेउ लखन भल घाटू, करहु कतहुं अब ठाहर ठाटू। लखन दीख पय उतर करारा, चहुं दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥ भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि घाट बहुत अच्छा है। अब यहीं कहीं पर ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मण जी ने पयस्विनी नदी के उत्तर के ऊंचे किनारे को देखा और कहते हैं कि इसके चारों ओर धनुष के जैसा एक नाला फिरा हुआ है।
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लक्ष्मणजी जी भगवान राम को मंदाकिनी के स्थान को दिखाते हैं और भगवान राम उसको देखकर प्रसन्न होते हैं। जब देवताओं को आभास हो गया कि भगवान राम का मन यहां पर रम गया है तो वह विश्वकर्मा को साथ लेकर पहुंचे। कोल-भीलों के वेष में आए देवताओं ने पत्तों और घास से सुंदर घर का निर्माण किया। लक्ष्मणजी, जानकीजी सहित प्रभु श्रीरामचंद्र घास-पत्तों के घर में शोभायमान हो रहे हैं। देवता आसमान से फूलों की बरसात करते हैं। देवता भगवान राम से कहते हैं कि हे नाथ आज हम सनाथ हो गए। चित्रकूट में भगवान राम के निवास करते ही वन की शोभा और बढ़ जाती है। सभी चित्रकूट और मंदाकिनी के भाग्य की सराहना करते हुए नहीं थकते हैं।
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धनुषभंग के साथ शुरू हुई तुलसीघाट की रामलीला
तुलसीघाट पर धनुषभंग के साथ ही रामलीला आरंभ हो गई। रविंद्रपुरी में जनक पुरी का दृश्य सजाया गया। भगवान राम ने जैसे ही शिव धनुष को भंग किया सीता ने उनका वरण किया।