बीएचयू के वैज्ञानिक बोले: जंगल की आग से हिमालय में बढ़ रहा नाइट्रोजन का असंतुलन, ग्लेशियर पिघलने की गति भी तेज
वैश्विक विज्ञानियों के समूह ने जंगल की आग से होने वाले उत्सर्जन और उसके दुष्प्रभावों पर अध्ययन किया है। बीएचयू के पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान के डॉ. किरपा राम भी इस वैश्विक शोध की टीम का हिस्सा थे।
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जंगल की आग हिमालय और तिब्बत के पठार में नाइट्रोजन असंतुलन का सबसे बड़ा कारण है। इससे प्रदूषक तत्वों की मात्रा बढ़ रही है और मानव स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी तंत्र और क्षेत्रीय जलवायु पर विपरीत असर हो रहा है। ग्लेशियर पिघलने की गति में भी तेजी आई है। वैश्विक विज्ञानियों के समूह ने जंगल की आग से होने वाले उत्सर्जन और उसके दुष्प्रभावों पर अध्ययन किया है।
बीएचयू के पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान के डॉ. किरपा राम भी इस वैश्विक शोध की टीम का हिस्सा थे। टीम पहली बार इस क्षेत्र में नाइट्रोजन एरोसोल के स्रोत की पहचान करने में सक्षम हुई है जो अब तक अज्ञात थे। अध्ययन से संकेत मिलता है कि जंगल की आग के कारण मार्च और अप्रैल के महीनों के दौरान नाइट्रोजन की सांद्रता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
अध्ययन के निष्कर्ष विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। डॉ. किरपा राम ने बताया कि अध्ययन ने नाजुक और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हिमालय और तिब्बती पठार (एचटीपी) क्षेत्र में नाइट्रोजन एरोसोल की प्रचुरता, स्रोतों और जमाव का पता लगाया। जंगल की आग की घटनाएं ज्यादातर मार्च-अप्रैल में अपेक्षाकृत होती हैं, लेकिन उन्होंने न केवल वायुमंडलीय नाइट्रोजन सांद्रता को काफी हद तक बढ़ा दिया है, बल्कि इसकी संरचना भी बदल दी है।
बढ़ सकती है ग्लेशियर पिघलने की गति
दक्षिण एशिया से जंगल की आग की गतिविधियों और प्राकृतिक धूल एरोसोल से उत्सर्जित मानवजनित एरोसोल (जैसे काले और भूरे कार्बन) के लंबी दूरी तक पंहुचने के कारण प्राचीन हिमालयी क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर बढ़ गया है। इससे उच्च वर्षा की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है। हिमालय क्षेत्र की तलहटी के अलावा ब्लैक कार्बन (बीसी) के जमाव से ग्लेशियरों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हो सकती है।
वैज्ञानिकों की टीम में तिब्बती पठार पृथ्वी प्रणाली, संसाधन और पर्यावरण की राज्य प्रमुख प्रयोगशाला (टीपीईएसआरई), तिब्बती पठार अनुसंधान संस्थान, चीनी विज्ञान अकादमी (सीएएस) और अंतरराष्ट्रीय सहयोगी जियोटॉप/यूनिवर्सिटी डु क्यूबेक, मॉन्ट्रियल (यूक्यूएएम), कनाडा के शोधकर्ता भी शामिल थे।