Nikay Chunav Result: पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र में BJP की ऐतिहासिक जीत के पांच कारण, सपा के लिए टेंशन की बात
यूपी निकाय चुनाव में वाराणसी में विपक्ष का सूपड़ा साफ हो गया। मेयर पद के प्रत्याशी अशोक तिवारी ने 1,33,137 वोटों के रिकॉर्ड अंतर से सपा के ओपी सिंह को चुनाव में हरा दिया। इससे पहले मेयर पद के किसी प्रत्याशी ने इतने बड़े अंतर से चुनाव नहीं जीता है।
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यूपी नगर निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को पीएम मोदी संसदीय क्षेत्र वाराणसी में ऐतिहासिक जीत मिली। भाजपा के गढ़ में विपक्ष का सूपड़ा साफ हो गया। कांग्रेस, बसपा और आम आदमी पार्टी के मेयर पद के प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। मेयर पद के प्रत्याशी अशोक तिवारी ने 1,33,137 वोटों के रिकॉर्ड अंतर से सपा के ओपी सिंह को चुनाव में हरा दिया। इससे पहले मेयर पद के किसी प्रत्याशी ने इतने बड़े अंतर से चुनाव नहीं जीता है।
नगर निगम के इतिहास में पहली बार शहर में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है। साथ ही पहली बार पार्षद पद के कुल 63 प्रत्याशी चुनाव जीतकर मिनी सदन पहुंचे हैं। मेयर के चुनाव में जितने मत भाजपा को मिले हैं, उतने सपा और कांग्रेस प्रत्याशी मिलकर भी नहीं प्राप्त कर सके। कांग्रेस के वोट बैंक में भी गिरावट आई है।
वाराणसी में मेयर सीट पिछले 28 वर्षों से भाजपा के पास है, इसलिए जीत के अलग मायने निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि सत्ता विरोधी लहर के बाद भी प्रचंड जीत हुई है। इसमें संगठन, सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है। वाराणसी में भाजपा को मिली इस ऐतिहासिक जीत के कई कारण हैं।
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सीएम योगी ने संभाला था मोर्चा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी में निकाय चुनाव की कमान खुद संभाली थी। पहले प्रबुद्ध सम्मेलन और फिर शिवपुर में जनसभा करके प्रचंड जीत की पटकथा लिख दी थी। वह चुनावी तैयारियों का लगातार फीडबैक ले रहे थे।भाजपा ने न केवल रणनीति बनाई बल्कि संगठन के पदाधिकारियों और प्रत्याशियों को वार्ड में मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी। इसका सकारात्मक परिणाम सामने आया है।
मुस्लिम मतों के बिखराव का मिला भाजपा को फायदा
वाराणसी में मुस्लिम मतों के बिखराव ने भाजपा की राह आसान कर दी। शहरी क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता दो धुरी में बंटे दिखे। कांग्रेस से जीतने वाले आठ पार्षद मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से आते हैं। ठीक यही हाल सपा का भी रहा है। शहरवासियों का कहना है कि मुस्लिम मतों का बिखराव न होता तो भाजपा को इतनी बंपर जीत नहीं नसीब होती। भाजपा ने एकमात्र मुस्लिम प्रत्याशी हुमा बानो को मदनपुरा से चुनाव उतारा था। मगर, यहां मतदाताओं ने हुमा बानो को नकार दिया। वह अपनी जमानत तक नहीं बचा पाईं।
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अखिलेश यादव ने नहीं किया चुनाव प्रचार
वाराणसी नगर निगम चुनाव में भाजपा ने जीत के लिए ताकत झोंक दी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ, दोनों उपमुख्यमंत्री समेत कई मंत्रियों ने वाराणसी में चुनाव प्रचार किया। इसके उलट सपा, कांग्रेस और बसपा के बड़े नेताओं ने वाराणसी में प्रचार से दूरी बनाई। सपा प्रमुख अखिलेश यादव, उनके चाचा शिवपाल यादव या रामगोपाल यादव चुनाव प्रचार के लिए वाराणसी नहीं आए।
टिकट बंटवारे के बाद उपजे गतिरोध से सपा को नुकसान
प्रत्याशी पद के टिकट बंटवारे को लेकर वाराणसी में समाजवादी पार्टी में घमासान मचा था। जिनका टिकट कटा था उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा नेताओं से पैसे लेकर टिकट दिए गए। चुनाव की तिथि तक टिकट बंटवारे से उपजे गतिरोध को समाजवादी पार्टी सहेज नहीं पाई। आलम यह रहा कि निकाय चुनाव में मेयर पद पर भाग्य आजमा रहे सपा के ओम प्रकाश सिंह की जमीन इस चुनाव में खिसक गई। जिस वार्ड में पिछले 30 साल से वह व उनके पारिवारिक सदस्य पार्षद रहे, वहां भी चुनाव हार गए।
पीएम मोदी को घेरने की योजना धरी रह गई
विपक्ष का सारा जोर काशी नगर निगम का चुनाव जीतने पर था। सपा, बसपा और कांग्रेस ने जातीय, सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर प्रत्याशी भी उतारे। काशी के विकास मॉडल की आलोचना की गई और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इसके बावजूद विपक्ष बनारस में धड़ाम हो गया। विपक्षी नेताओं का कहना था कि काशी में जीत के जरिये पीएम मोदी को घेरा जा सकेगा। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले उनके विकास मॉडल पर सवाल उठाए जा सकेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। विपक्ष की सारी योजना फेल हो गई।
एक तीर से दो निशाने की योजना भी फेल
पीएम के संसदीय क्षेत्र में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का खूब आना होता है। पिछले छह वर्षों के दौरान मुख्यमंत्री 100 से ज्यादा बार वाराणसी आ चुके हैं। वह भी वाराणसी के विकास मॉडल को अपनाने की वकालत करते थे। विपक्ष की मंशा थी कि एक तीर से दो निशाने किए जाएं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।