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जनता के आगे न घर देखा न परिवार

Thu, 26 Jan 2017 02:26 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Thu, 26 Jan 2017 02:26 AM IST
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Neither the public nor the family home in
इंदिरा गांधी के साथ प्रभुनारायण सिंह परभू बाबू ।
यूपी की सत्ता में चार बार मंत्री रहे सोशलिस्ट नेता प्रभुनारायण सिंह परभू बाबू ने मजदूरों, किसानों, गरीबों की हिमायत के आगे सत्ता का मोह नहीं पाला। वह देश के अकेले ऐसे नेता थे जो मंत्री रहते हुए ऑफीशियल लैंग्वेज बिल के विरोध और हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के पक्ष में संसद के सामने सत्याग्रह करने के आरोप में गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में डाल दिए गए थे। कपड़ा मिल मजदूरों पर गोली चलाने की घटना से नाराज होकर श्रममंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इस अंक में पढ़िए परभू बाबू के उन राजनीतिक संघर्षों के बारे में जिन्हें अब दोहराना संभव नहीं लगता। 
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परभू बाबू जमीन के नेता थे। वो चाहे विपक्ष की राजनीति में रहे या सरकार में, उनके लिए जनता के दर्द के आगे सत्ता के मायने नहीं थे। काशीपुरा मुहल्ले की संकरी गली में उनका वह दफ्तर आज भी उसी तरह है, जिसकी फर्श पर दरी बिछाकर तब डॉ. राम मनोहर लोहिया, लोक नायक जय प्रकाश नारायण,लोक बंधु राजनारायण, आचार्य कृपलानी जैसे राजनेता रात-रात भर गरीबों के सवाल पर चिंतन करते थे। आंदोलन की रणनीति बनती थी। 1937 में इसी काशीपुरा के कबूतर बाजार मैदान में पं. जवाहर लाल नेहरू, खान अब्दुल गप्फार खां, डॉ. संपूर्णानंद, पं. कमलापति त्रिपाठी के साथ पहली बार चुनावी सभा में हिस्सा लेने के बाद परभू बाबू ने भारत छोड़ो आंदोलन में जुट गए।

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 88वर्षीया उनकी पत्नी दमयंती देवी बताती हैं कि 1945 में जेल से छूटने के बाद ही शादी हुई। इसके बाद वह आंदोलनों के चलते लगातार बाहर रहे। न घर की परवाह थी न बच्चों की, लेकिन भावुक बहुत थे। कहीं भी रहते, घर के सदस्यों के बारे में जरूर पूछा करते थे। एक बार मां जानकी देवी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई। 1959 में तब वह चंदौली से जगतनारायण दुबे को हराकर सांसद चुन लिए गए थे। मां जी की जान बचने की उम्मीद नहीं थी। लग रहा था कि मां जी की जान नहीं बचेगी। फोन पर इलाहाबाद में रहने वाले उनके एक राजनीतिक सहयोगी को इसकी जानकारी दी गई। रात को ही वह लखनऊ से घर आए और तत्काल मां जी को अस्पताल में भर्ती कराया और रात भर उनके साथ अस्पताल में रहे।

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वाराणसी। परभू बाबू की पत्नी दमयंती देवी बताती हैं कि एक बाद जब वह मंत्री बन चुके थे, तब पहली बार काशीपुरा आए तो नेताओं के साथ जनता की भीड़ लग गई। शाम तक वह जनता की फरियाद सुनने में ही व्यस्त रहे। शाम तक मुझसे बात करने की फुर्सत नहीं मिल सकी। घर के बाहर वाले बरामदे से ही वह लखनऊ चले गए। वहां जाने के बाद उन्होंने रात को फोन कर मुझसे बात की। बोले- क्या करोगी, तुमसे तो मैं किसी भी समय बात कर लूंगा लेकिन जो गरीब दूर-दराज से मुझसे मिलने आए थे, वह निराश होकर चले जाते तो मेरे मंत्री होने न होने का मतलब क्या निकलता। 

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