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नीरज शेखर का पूरा परिवार लोकसभा चुनाव से बाहर था, पत्नी को भी नहीं मिला था टिकट

Mon, 15 Jul 2019 09:33 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Mon, 15 Jul 2019 09:33 PM IST
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neeraj shekhar family was out from lok sabha election 2019 resign from samajwadi party ballia
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के जन्म दिन पर केक काटकर सांसद नीरज शेखर को खिलाते सपा जिलाध्यक्ष संग्राम सिंह यादव (फाइल फोटो)। - फोटो : अमर उजाला

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर और समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दे दिया। अब उनके बीजेपी में शामिल होने अटकलें आ रही हैं। वहीं आपको बता दें कि देश के 9वें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर सहित उनका पूरा परिवार लोकसभा चुनाव से बाहर था।

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नीरज शेखर एक उपचुनाव और दो आम चुनाव बलिया से जीते थे। 2014 की मोदी लहर में भाजपा के भरत सिंह से हारने के बाद नीरज को राज्यसभा में भेज दिया गया था। इस बार ना तो उनको टिकट दिया गया और ना ही उनकी पत्नी सुषमा शेखर को टिकट दिलाने की कोशिश कारगर हुई थी।
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चालीस वर्ष बाद यह पहला अवसर था, जब चंद्रशेखर के परिवार के किसी सदस्य ने चुनाव नहीं लड़ा था। दूसरी ओर टिकट काटे जाने के बाद कुछ लोग नीरज के वजूद पर ही सवाल उठाने लगे थे। 
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पूर्व पीएम चंद्रशेखर ने पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व किया :
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व किया है। चंद्रशेखर ने आठ बार अपने जिले बलिया की सीट का प्रतिनिधित्व संसद में किया था। उसके बाद चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर ने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। लेकिन इस बार के लोक सभा चुनावों में चंद्रशेखर का परिवार मैदान से बाहर था।

बलिया लोकसभा सीट लंबे समय तक पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नाम से जानी जाती रही। जनता पार्टी की लहर में 1977 से 2004 तक चंद्रशेखर ने संसद में आठ बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। बाद में यह सीट उनके पुत्र नीरज शेखर के पास थी। अपने जीवनकाल में ना तो चंद्रशेखर ने बलिया छोड़ा और ना बलिया के वोटरों ने उनको।

इस दौरान 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर जगन्नाथ चौधरी से हार गए थे। राजनीति में कितने भी उलटफेर हुए हों। अपने बयानों और काम से चंद्रशेखर की आलोचना देश भर में हुई लेकिन बलिया की जनता हमेशा उनके साथ रही थी। उनके निधन के बाद यह सीट उनके छोटे पुत्र नीरज शेखर के पास रही।

पहले चुनाव में निर्दलीय सांसद चुने गए :
बलिया के बागीपन की कहानी लोकसभा के पहले आम चुनाव में ही दिख गई थी। 1952 में कांग्रेस के टिकट नहीं देने पर मुरली बाबू ने निर्दलाय चुनाव लड़ा था। उन्होंने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के बेटे गोविंद मालवीय को पराजित किया। 1962 में कांग्रेस ने मुरली बाबू को प्रत्याशी बनाया और वह जीते। 1967 और 1971 में भी यहां से कांग्रेस जीती।

परिसीमन से बदला लोकसभा का भूगोल :
2009 में हुए परिसीमन में बलिया लोकसभा सीट का पूरा भूगोल बदल गया। इस लोकसभा क्षेत्र में बलिया जिले के तीन विधानसभा क्षेत्र बैरिया, बलिया सदर और फेफना के अलावा गाजीपुर जिले की दो विधानसभा सीटें जहूराबाद और मुहम्मदाबाद को मिलाकर बलिया लोकसभा क्षेत्र बनाया गया है।

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