RBSK: 10 साल से नहीं मिलीं दवाइयां, 47 तरह की जांच, पर वजन जांचने की मशीन ही नहीं, कैसे करेंगे बच्चों का इलाज
Varanasi News: राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम का संचालन केवल कागजों पर ही किया जा रहा है। हर ब्लॉक में हैं इसकी दो टीमें हैं। लेकिन इनके पास वजन मशीन तक नहीं है। ऐसे में बिना मशीन के कुपोषित बच्चों की पहचान करना मुश्किल हो गया है।
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राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) कागज पर तो चल रहा है लेकिन इसमें लगी टीमों के पास वजन और जांच करने वाली मशीनें तक नहीं हैं। पिछले 10 वर्षों से जरूरी दवाइयां भी नहीं मिल रही हैं। अगर किसी बच्चे को दवाइयों की जरूरत होती है तो उसे पीएचसी पर भेजना पड़ता है। वजन जांच की मशीन न होने से गांवों में कुपोषित बच्चों की पहचान करने में भी परेशानी हो रही है।
आरबीएसके के तहत जिले के सभी ब्लॉकों में दो-दो टीमें गठित की गई हैं। इनमें दो मेडिकल ऑफिसर और दो पैरामेडिकल स्टाफ शामिल हैं। टीमों पर हर सप्ताह ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले गांवों में सोमवार से शुक्रवार तक भ्रमण कर जन्म से लेकर 18 वर्ष तक के बच्चों के स्वास्थ्य की निगरानी की जिम्मेदारी होती है। इसके तहत जन्मजात बीमारियां, विटामिन की कमी से होने वाली बीमारियां, बच्चों के विकास संबंधी समस्याएं, वजन की जांच, दिल में छेद की समस्या सहित 47 प्रकार की बीमारियों की जांच की जाती है। यदि किसी बच्चे में कोई समस्या मिलती है तो उसे शनिवार को संबंधित ब्लॉक के पीएचसी की ओपीडी में बुलाकर आगे का इलाज शुरू कराया जाता है।
कागजों पर स्वास्थ्य विभाग भले ही बड़े-बड़े दावे कर रहा हो, लेकिन आरबीएसके की हकीकत यह है कि इसका संचालन जैसे-तैसे किया जा रहा है। कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य की सही जानकारी के लिए वजन का मापन बेहद जरूरी होता है, लेकिन आरबीएसके टीम के पास कोई वजन मशीन ही नहीं है। डॉक्टरों द्वारा सीने में कफ आदि की जांच के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला स्टेथोस्कोप भी कई बार टीम के पास उपलब्ध नहीं रहता।
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वर्ष 2017 यानी करीब 10 साल पहले तक टीमों को सीएमओ कार्यालय स्थित सेंट्रल ड्रग स्टोर से दवाइयां मिलती थीं, ताकि भ्रमण के दौरान जरूरत पड़ने पर बच्चों को तत्काल दवा दी जा सके। अब टीम के सदस्यों को पहले संबंधित स्वास्थ्य केंद्र जाकर दवा लेनी पड़ती है। उसमें भी जो दवाइयां उपलब्ध होती हैं, वही लेकर टीम निकलती है। टीम में शामिल एक सदस्य के अनुसार, जब वजन मापने की मशीन और जरूरी दवाइयां ही नहीं मिलेंगी तो कुपोषित बच्चों की पहचान करने और अन्य बीमारियों से पीड़ित बच्चों को लाभ दिलाना मुश्किल हो जाता है। आरबीएसके की बड़ी समस्याएं आरबीएसके हरहुआ टीम को मिले वाहनों का भुगतान पिछले नौ महीने से नहीं हो पाया है। पिछले दो महीने से टीम के पास कोई गाड़ी नहीं है। जैसे-तैसे टीम के सदस्य बच्चों की जांच करने पहुंच रहे हैं।
बच्चों को जांच के बाद वजन बेहतर रखने के लिए आयरन और फोलिक एसिड सप्लीमेंट दिए जाते हैं, लेकिन कई जरूरी दवाइयां नियमित रूप से उपलब्ध नहीं हो पातीं। आरबीएसके के तहत आठ ब्लॉकों में कार्यरत डॉक्टरों समेत कुल 64 कर्मचारियों को मार्च और अप्रैल 2026 का मानदेय भी नहीं मिला है।
क्या है आरबीएसके
बच्चों के जन्म से लेकर 18 वर्ष की आयु तक उनके स्वास्थ्य की निगरानी करने, कुपोषित बच्चों की पहचान करने और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से निजात दिलाने के उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग की ओर से आरबीएसके संचालित किया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2013 में हुई थी। इसके तहत हर ब्लॉक में दो-दो टीमें गठित हैं। प्रत्येक टीम में मेडिकल ऑफिसर समेत चार सदस्य होते हैं। आरबीएसके के तहत 47 बीमारियों से प्रभावित बच्चों की पहचान कर उन्हें जरूरी जांच और इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
क्या बोले अधिकारी
आरबीएसके की टीम को अगर जरूरी दवाइयां, वजन करने वाली मशीन और अन्य संसाधन मिल जाएं तो बच्चों की जांच और इलाज कराने में बड़ी राहत होगी। पिछले दिनों लखनऊ में हुई संघ की बैठक में भी एनएचएम कर्मियों को समय से मानदेय न मिलने और आरबीएसके के संचालन में आने वाली समस्याओं पर चर्चा हुई। जल्द ही शासन को पत्र भेजकर व्यवस्थाएं सुनिश्चित कराने की अपील की जाएगी। -अब्दुल जावेद, जिलाध्यक्ष, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन संविदा कर्मचारी संघ