UP : अध्यापिका की हत्या का मामला..., पति और सास सहित चार को उम्रकैद; रोंगटे खड़े कर देगा बेटी का ये बयान
इस मामले में आठ वर्षीय बेटी का बयान भी दर्ज हुआ था। बेटी ने पूरी घटनाक्रम को बताया था। घटना के वक्त उसके दादा ने डांटकर उसे भगा दिया था। अगली सुबह पूरे कमरे में खून बिखर हुए थे। विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) की अदालत ने इस मामले में फैसला सुनाया है।
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विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) सपना शुक्ला की अदालत ने डुढुवां (मीता का पुरा) निवासी पति राजेश कुमार, देवर रजनीश व सास चंपा देवी और उमरहा के सतीश कुमार को आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया है। अदालत ने पति को एक लाख एक हजार, सास को 51 हजार और देवर व सतीश को 56-56 हजार रुपये के अर्थदंड से भी दंडित किया है।
दोषियों को सजा दिलाने में अध्यापिका की आठ वर्षीय पुत्री इशिता का बयान महत्वपूर्ण साबित हुआ। इशिता ने कहा कि उसकी मां को उसके पिता सहित अन्य लोग दूसरे कमरे में ले गए। वह कमरे की ओर गई तो उसके दादा ने उसे डांट कर भगा दिया।
अगली सुबह वह उस कमरे में गई तो वहां उसकी मां का खून से सना कपड़ा और खून गिरा हुआ पड़ा था। वह अपने दादा-दादी से पूछती रही कि उसकी मां कहां है, लेकिन किसी ने उसे कुछ नहीं बताया। उसी कमरे से दो हंसिया भी बरामद हुआ था।
सहायक अध्यापिका थी किरनबाला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, गाजीपुर के खानपुर थाना क्षेत्र के करनपुर निवासी बलिराम राम ने चौबेपुर थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। बलिराम के अनुसार उनकी बेटी किरनबाला की शादी वर्ष 1999 में डुढुवां (मीता का पुरा) निवासी राजेश कुमार के साथ हुई थी। राजेश जूनियर हाईस्कूल धौरहरा में अध्यापक था। किरनबाला जूनियर हाईस्कूल डुढुवां में सहायक अध्यापिका थी।
वर्ष 2004 में उनके दामाद राजेश का छोटे भाई मृत्युंजय घरेलू कलह के कारण आत्महत्या कर लिया था। इसी के बाद से उनकी पुत्री किरनबाला के साथ उसके पति, ससुर, सास और एक अन्य देवर रजनीश गालीगलौज करते थे।
23 अप्रैल 2011 को उनकी बेटी की सहेली साधना देवी ने उन्हें सूचना दी कि किरनबाला घर पर नहीं है। बेटी के कमरे में गए तो वहां दो स्थान पर अधिक मात्रा में खून जमीन पर गिरा दिखाई दिया और दो हंसिया भी मिली। दोनों हंसिया में खून लगा हुआ था। अपराह्न तीन बजे सूचना मिली कि ग्राम सरैया के पास गोमती नदी में एक औरत का शव पड़ा है।
शव को निकाला गया तो उसकी पहचान किरनबाला के रूप में हुई। कोर्ट में अभियोजन की ओर से अध्यापिका की आठ वर्षीय पुत्री का बयान ही आरोपियों के गले की फांस बना। कोर्ट ने दोनों पक्ष को सुनने और साक्ष्य के अवलोकन के बाद आरोपियों को दोषी पाते हुए सजा सुनाई।