मदर्स डे विशेष: मां और बेटे की ये कहानी बड़ी ही दिलचस्प, मेहनत से हासिल किया ये मुकाम
वाराणसी के राजातालाब के एक छोटे से गांव की रहने वाली किसान की बेटी रेखा मौर्या को बचपन से ही खेलों में रुचि थी। मगर एक लड़की होने के नाते कई मर्यादाओं का पालन भी जरूरी था। बावजूद इसके राज्य स्तरीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता।
मगर नेशनल में खेलने का सपना अधूरा रह गया। रेखा ने अपने सपने को पूरा करने के लिए अपने बेटे को इस काबिल बनाया और बेटे ने मां के सपने को पूरा कर नेशनल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता।
रेखा पांच बहन और एक भाई में सबसे छोटी हैं। उनका विवाह 18 वर्ष की उम्र में सन 2003 में चिरईगांव में हुआ। ससुराल में तमाम सामाजिक बंदिशों के बावजूद अपने परिजनों से अनुमति लेकर रेखा ने पढ़ाई-लिखाई और खेल जारी रखा। इस बीच दो बच्चों की मां भी बनी।
मध्यप्रदेश में 2014 में आयोजित राज्य स्तरीय ताइक्वांडो में कांस्य पदक जीता। इसकी बदौलत ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी के लिए भी चयन हुआ था, मगर 25 वर्ष से अधिक उम्र होने के कारण नहीं खेल सकी।
इसके बाद राष्ट्रीय रेफरी परीक्षा पास कर काशी विद्यापीठ में मार्शल आर्ट के कैंप में बतौर मुख्य प्रशिक्षक अपना कार्य करने लगी। मगर उनके नेशनल का सपना अभी अधूरा था, जिसके लिए उन्होंने अपने बड़े बेटे को ताइक्वांडो खेलने को कहां, लेकिन उसने इनकार कर दिया। तब 11 साल के छोटे बेटे उत्कर्ष ने मां के सपने को पूरा किया। उसने ओपन नेशनल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर मां के सपनों को पूरा किया।